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रजत मानक और इसकी सममूल्यता का विस्थापन

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सोने के मुकाबले चांदी की कीमत में कमी व अस्त-व्यस्तता आने के कारणों में उत्पन्न विवाद से एक कारण बिल्कुल स्पष्ट था। एक पक्ष का तर्क था कि चांदी का आस्थगन अथवा विमुद्रीकरण न किया जाता तो इसके मूल्य में कभी गिरावट न आती। इस स्थिति को दूसरे पक्ष ने जोरदार चुनौती दी। उसका विश्वास था कि चांदी के अवमूल्यन का मुख्य कारण इसकी अधिक मात्रा में आपूर्ति तथा तुलनात्मक रूप से चांदी की अधिक आपूर्ति का तर्क चांदी के स्वर्ण-मूल्य में गिरावट के लिए यथेष्ट कारण है। देखने में ऐसा लगता है कि इस व्याख्या में एक साधारण प्रस्ताव की संभावना है। यह राजनीतिक अर्थव्यवस्था के प्रारंभिक सिद्धांतों में से एक सिद्धांत है कि किसी वस्तु का मूल्य उसकी आपूर्ति के अनुपात में विपरीत गति से भिन्न होता है और यदि चांदी की सप्लाई में अत्यधिक वृद्धि हो जाती तो क्या सोने के मूल्य की तुलना में चांदी का मूल्य स्वाभाविक रूप से गिर जाता? आगे दिए गए कुछ ऐसे युक्तिसंगत तथ्य हैं जो इस तर्क का आधार बनाते हैं (देखिएµ तालिका X )

इस प्रकार प्रस्तुत किए गए तथ्यों से दो निष्कर्ष निकलते हैं। प्रथम निष्कर्ष यह है कि चांदी के तुलनात्मक उत्पादन में अनुमानित अधिक वृद्धि ऐसी अभिधारणा है जिसका वास्तव में कोई आधार नहीं था। इसके विपरीत तुलनात्मक उत्पादन के आंकड़ों पर सिंहावलोकन से ऐसा अजीब तथ्य प्रकट होता है कि अठारहवीं शताब्दी के प्रारंभ से ही चांदी में वृद्धि के बजाय आनुपातिक रूप से उसमें कमी आई है। उन्नीसवीं शताब्दी की प्रथम चौथाई अवधि को छोड़कर तालिका में दिखाई गई दो शताब्दियों में चांदी का उत्पादन सोने की तुलना में कम हुआ है। ख्1, वास्तव में चांदी का अनुपात इतना कभी भी कम न था जैसा कि उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम अर्ध भाग में रहा और यहां तक कि 1873 के बाद जैसे उसकी वृद्धि होना शुरू हुई, यह उस परिमाण का आधा भाग भी नहीं पहुंचा जो अठारहवीं शताब्दी के प्रारंभ में हो गया था। इन तथ्यों ने दूसरे निष्कर्ष का दावा किया, इसका संबंध सोने के हिसाब से चांदी का मूल्य सोने की तुलना में उसकी सप्लाई के अनुरूप आगे नहीं सरका। सिद्धांत के अनुसार चांदी का मूल्य ऊंचा होना चाहिए था क्योंकि तुलनात्मक दृष्टि से उत्पादन का स्वरूप घट रहा था। दूसरी ओर तुलनात्मक मूल्य और तुलनात्मक उत्पादन के आंकड़ों की बारीकी से जांच से, जैसा कि आगे की तालिका में दिया गया है, बताया गया है कि बजाय इसके कि उनके बीच नजदीकी संबंध हों उसके विपरीत दिशा इंगित की (देखिएµचार्ट III )। आपूर्ति और मूल्य के विपरीत अनुपात के बजाए इससे यह

  1. इस प्ररप्रेक्ष्य में यह आश्चर्यजनक बात है कि प्रोफेसर डब्ल्यू लेक्सिस जैसे प्रमुख अर्थशास्त्री द्विधातुवादी

नहीं बन पाये। जिसका कारण यह था कि सोने के साथ स्थायी रूप से अधिक अनुपात की स्थापना

के विरुद्ध संघर्षरत चांदी की अधिक वृद्धि रही। देखिएµउनका निबंध ‘‘दि प्रजेंट मानेटरी सिचुएशन

(वर्तमान मुद्रा की स्थिति)’’ इकोनॉमिक स्टडीज ऑफ दि अमेरिकन इकोनॉमिक एसोसियेशन (अमरीकी

आर्थिक संघ का आर्थिक अध्ययन) 1986 खंड I संख्या 4 पृष्ठ 2737-77 मूल्य के हिसाब से चांदी

के उत्पादन को मापने की आदत निस्संदेह इस नितांत आधारहीन विचार के लिए अधिकांशतया उत्तरदायी

है।