3. रजत मानक और इसकी अस्थिरता के दोष - Page 115

100 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

कि कुछ भुगतान इंग्लैंड में करे। ऐसे भुगतानों में निम्नलिखित शामिल थेः- (1)ऋण पर तथा प्रत्याभूत रेलवे कंपनियों के स्टॉक पर ब्याज_ (2) भारत में तैनात यूरोपीय सेना के रखरखाव के कारण होने वाला व्यय। (3) पेंशन तथा निष्प्रभावी भत्ते जो इंग्लैंड में देय होते थे। (4) गृह प्रशासन का खर्च ख्1, । (5) भारत में प्रयोग तथा उपयोग के लिए इंग्लैण्ड में खरीदा गया माल। चूंकि इंग्लैंड स्वर्णमान वाला देश था अतः उक्त भुगतान सोने में ही किए जाने आवश्यक थे। परंतु भारत सरकार के जिस राजस्व में से इन भुगतानों को किया जाता था वह राजस्व चांदी में प्राप्त होता था जो कि देश की एक मात्र विधिमान्य मुद्रा थी। यह बात स्पष्ट है कि यद्यपि स्वर्ण भुगतान एक निश्चित मात्रा में होते थे, परंतु चांदी के स्वर्ण मूल्य में गिरावट होने के साथ ही उनके भार में सममूल्य पर वृद्धि होना अवश्यंभावी था। परंतु स्वर्ण भुगतानों की मात्रा निर्धारित नहीं थे। वे निरंतर वृद्धि की दिशा में अग्रसर होते रहे जिससे कि रुपए के रूप में मूल्य में वृद्धि, उनकी मात्रा में वृद्धि के कारण तथा माध्यम अर्थात् स्वर्ण का मूल्यांकन जिसमें वे देय होते थे, के संकुचन के कारण भी होती थी। इस दोहरी उगाही ने भारत के राजस्व को कितना अधिक घटाया, इसका युक्ति युक्त प्रमाण तालिका 11 में दिए गए आंकड़ों से मिलता है।

सरकार की वित्त व्यवस्था पर ऐसे बढ़ते हुए भार का कितना प्रभाव पड़ता था, उसकी कल्पना भली-भांति की जा सकती है। सरकार की स्थिति लगातार बढ़ते हुए भार से अर्थ संकट के कारण पहले उलझनपूर्ण हुई और बाद में बिल्कुल निराशाजनक हो गई। उसने सरकार की वित्त व्यवस्था में ऊंचे कर लगाने एवं कठोर बचत की नीति लागू की। वर्ष 1872-73 से भारतीय बजट के स्रोत वाले पक्ष का विश्लेषण करने पर हमें पता चलता है कि कोई भी ऐसा वर्ष नहीं था जिसके समाप्त होने से पहले देश के वर्तमान करों व चुंगी में वृद्धि न की गई हो। वर्ष 1872-73 में ‘‘प्रान्तीय उपकर की उगाही आरंभ हुई। वित्तीय वर्ष 1875-76 में स्पिरिट पर उत्पादन कर में एक रुपया प्रति गैलन की दर से वृद्धि हुई। वर्ष 1877-78 में मालवा अफीम पर पास ड्यूटी (शुल्क) प्रति पेटी (चैस्ट) 600 रुपये से बढ़ाकर 650 रुपये कर दी गई। वर्ष 1878-79 में लाइसेंस कर तथा स्थानीय दरों में वृद्धि की गई और अगले वर्ष मालवा अफीम शुल्क में पचास रुपये प्रति पेटी वृद्धि हुई। इन करों व महसूलों की सहायता से सरकार को आशा थी कि इनसे उसकी वित्तीय स्थिति को पर्याप्त सहारा मिल जाएगा व उसमें सुधार हो जाएगा। 1882 के अंत तक, उसने आर्थिक दृष्टि से बिल्कुल सुरक्षित महसूस किया, यहां तक कि उसने कुछ करों को वापस कर दिया इसके लिए उसने उत्तर-पश्चिम प्रांतों में पटवारी उपकर तथा सीमा शुल्कों को कम कर दिया। परन्तु विनिमय में तेज गति से होने वाली गिरावट ने यह दर्शा दिया कि आगे और कराधान का सहारा लेना आवश्यक हो गया है जिससे पाउण्ड के भुगतान के मूल्य में हुई वृद्धि का सामना किया जा सके और उसे पूरा किया जा सके। इसलिए वर्तमान भार में 1886 में आय कर, 5 प्रतिशत शुल्क आयातित

  1. 1920 के सुधार अधिनियम (रिफार्म एक्ट) के समय से इस वर्ष जो मांग ‘‘राजनैतिक’’ थी उसे ब्रिटिश

प्राक्कलन में रख दिया गया है।