3. रजत मानक और इसकी अस्थिरता के दोष - Page 114

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अध्याय-3

रजत मानक तथा इसकी अस्थिरता के दोष

विनिमय साम्य के भेद के आर्थिक परिणाम अत्यंत व्यापक स्वरूप वाले थे। इसने व्यापारिक विश्व को ठीक-ठीक दो निश्चित समूहों में विभक्त कर दिया था। एक अपनी मानक मुद्रा के रूप में सोने का प्रयोग करने वाला समूह तथा दूसरा चांदी का प्रयोग करने वाला समूह था। जिस समय सोने की एक निश्चित मात्रा चांदी की निश्चित मात्रा के बराबर होती थी जैसा कि सन् 1873 के पहले था, उस समय अंतर्राष्ट्रीय लेन-देन व सौदों के लिए इस बात का कोई अधिक महत्व नहीं था कि कोई देश स्वर्णमान वाला है या रजतमान वाला, अर्थात् उसकी मुद्रा सोने की है या चांदी की है और न उस समय इस बात से कोई अंतर पड़ता था कि इन दोनों मुद्राओं में से उसके दायित्वों की पूर्ति व अदायगी किस मुद्रा में होती है। परंतु जब निश्चित सममूल्य की गड़बड़ के कारण यह निर्धारण करना संभव नहीं रहा कि प्रतिवर्ष तथा यहां तक कि प्रत्येक महीने में चांदी की अमुक मात्रा, सोने की अमुक मात्रा के बराबर है अर्थात् दोनों की मात्रा के मूल्यों में प्रतिवर्ष यहां तक कि प्रतिमास परिवर्तन होने लगा, तो मूल्य की इस यथार्थता, धन संबंधी विनिमय की आत्मा ही ने जुए की अनिश्चितता को उत्पन्न किया। इसमें संदेह नहीं, कि सभी देश जटिलताओं व समस्याओं के इस भंवर में एक समान रूप में उसी सीमा तक नहीं फंसे थे फिर भी अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में भाग लेने वाले किसी भी देश के लिए इसमें फसने से बचना असंभव था। यह बात भारत के संबंध में सच थी क्योंकि इसकी स्थिति किसी अन्य देश जैसी नहीं थी। भारत एक रजतमान वाला देश था जो स्वर्णमान वाले एक देश के साथ घनिष्ठ रूप से बंधा हुआ था जिससे इसका आर्थिक तथा वित्तीय जीवन उन अंध शक्तियों की दया पर निर्भर रहता था जो स्वर्ण तथा रजत (चांदी) के तुलनात्मक मूल्यों पर कार्य करती थी। ये शक्तियां रुपए तथा पौंड के विनिमय को नियंत्रित करती थीं।

इस गिरावट से उन देशों का व्यय भार बढ़ गया जिन्हें स्वर्ण में भुगतान करना पड़ता था। ऐसे देशों में भुगतान का सबसे अधिक भारत सरकार के ऊपर था। अपनी राजनीतिक संरचना की अपेक्षाओं के कारण उस सरकार के लिए यह आवश्यक था