102 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
दूसरा उत्पादन शुल्क नमकदार मछली पर छह आना प्रति मन की दर से लगा दिया गया। 1882-83 से उगाहे गए शुल्कों तथा करों से निम्नलिखित धनराशि प्राप्त हुई थी ख्1, ः-
स्रोत 1882-83 रुपये 1892-93 रुपये
नमक 5,67,50,000 8,14,90,000
उत्पादन शुल्क 3,47,50,000 4,97,90,000
सीमा शुल्क 1,08,90,000 1,41,80,000
निर्धारित कर 48,40,000 1,63,60,000
यह सब अतिरिक्त भार स्वर्ण भुगतान के मूल्यों में हुई वृद्धि के अनुसार रुपये में भुगतान करने के कारण हुआ था और ‘‘यदि विनिमय दर में गिरावट आती तो इस भार को बढ़ाना आवश्यक न होता। ख्2, स्रोतों में इस वृद्धि के साथ-साथ भारत सरकार ने प्रशासन पर होने वाले खर्च में भी मितव्ययता को लागू किया। अपने इतिहास में पहली बार सरकार ने बाहर से आए अंग्रेजों के स्थान पर देश के मूल निवासियों की अपेक्षाकृत सस्ती एजेंसियों को लगाने के विकल्प की ओर ध्यान दिया। 1870 से पहले इस रूप में मितव्ययता को लागू करने का क्षेत्र बहुत सीमित था। 1853 के सिविल सर्विस रिफार्म (नागरिक सेवा सुधार, 1853) ख्3, द्वारा उन पदों पर भारतवासियों की नियुक्ति का मार्ग खुल गया जो 1793 ख्4, के अधिनियम के अनुसार पारम्परिक सिविल सर्विस के सदस्यों के लिए आरक्षित थे। परन्तु इस सुधार से प्रशासन के खर्च में कोई किफायत होने में सहायता नहीं मिली, क्योंकि भारतीय सदस्य भी सिविल सेवा के अंग्रेज सदस्यों के समान ही वेतन के उच्च वेतनमान लेते थे। जब 1870 का अधिनियम (33 विक.सी3) पारित हुआ और उससे परंपरागत सिविल सेवा के लिए आरक्षित स्थानों पर गैरपरंपरागत भारतीयों के नामांकन द्वारा निम्न वेतनमानों पर नियुक्ति की अनुमति मिल गई तो भारत सरकार के समक्ष किफायत का वास्तविक मार्ग प्रशस्त हो गया। दबावग्रस्त भारत सरकार ने इस अधिनियम द्वारा प्रस्तुत किफायत की संभावनाओं का लाभ उठाया। सरकार के खर्च में कमी करने में सरकार की इतनी अधिक प्रबल रुचि थी और किफायत करने की इतनी अधिक आवश्यकता थी कि कुशल प्रशासन के लिए मांग में वृद्धि होते हुए भी, वह पारंपरिक सिविलियनों की अपेक्षाकृत अधिक
खर्चीली व्यवस्था के स्थान पर गैर-पारंपरिक सिविलियनों की कम खर्चीली/व्यवस्था
भारतीय मुद्रा समिति की रिपोर्ट, 1893, परिशिष्ट II, पृष्ठ 263
जे.ई.ओ.कोनोर, भारतीय मुद्रा समिति की रिपोर्ट, 1898 परिशिष्ट दो, पृष्ठ 182
लोक सेवा आयोग की रिपोर्ट-सी 5327-1887
अधिनियम का यह प्रावधान, 1861 के अधिनियम द्वारा पुनः लागू किया गया है