3. रजत मानक और इसकी अस्थिरता के दोष - Page 118

रजत मानक तथा इसकी अस्थिरता के दोष

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को प्रतिस्थापित करने की ओर अग्रसर हुई। जिस पैमाने पर यह प्रतिस्थापन किया गया, वह किसी भी रूप में कम नहीं था, क्योंकि हम देखते हैं कि 1874 से 1889 के बीच इंग्लैंड में भर्ती किए गए पारम्परिक सेवा वाले व्यक्तियों की संख्या में 22 प्रतिशत से अधिक की कमी हुई और इसमें आगे लगभग 12 प्रतिशत की और कमी होने की आशा थी। यह कमी साधारणतया पारम्परिक सिविलियनों के लिए आरक्षित मदों पर गैर-पारम्परिक सिविलियनों की नियुक्ति के कारण आई ख्1, प्रशासन में एक महंगी व्यवस्था के स्थान पर एक सस्ती व्यवस्था को प्रतिस्थापित करने के अलावा सरकार ने विभागीय फिजूलखर्ची की वृद्धि में कटौती को लागू करके राहत प्राप्त करने का भी प्रयास किया। उसने नित्य बढ़ती हुई विभागीय फिजूलखर्ची ख्2, वाली मदों पर कैंची चलाई। राजस्व को बढ़ाने व खर्चों में कटौती करने के बहादुरीपूर्ण प्रयास के बावजूद भी गिरते विनिमय की अवधि के दौरान सरकार की वित्तीय स्थिति कभी भी समृद्धिशाली नहीं हुई, जैसा कि तालिका XII में दर्शाया गया है।

इससे भी अधिक खेदजनक बात वित्तीय कठिनाइयों के कारण सार्वजनिक निर्माण के उपयोगी कार्यों के लिए धन जुटाने में सरकार के असमर्थ होने की थी। भारत की जनता का कल्याण देश में उपलब्ध स्रोतों से सर्वोत्तम लाभ उठाने पर निर्भर करता है। परंतु लोगों के अंदर जोखिम उठाने व उद्यम करने की बहुत ही कम भावना व हिम्मत है। अतएव, इस कार्य का भार भारत सरकार के कंधों पर आ गया है। यह कार्य देश को सतत आर्थिक जीवन की दो मुख्य आवश्यकताओं अर्थात् परिवहन प्रणाली तथा सिंचाई के नेटवर्क को प्रदान करना है। इस लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए सरकार ने ‘‘असाधारण सार्वजनिक निर्माण कार्यों’’ को विकसित करने की नीति की शुरुआत की थी। इन कार्यों के लिए वित्तीय व्यवस्था पूंजी उधार लेकर की गई थी। ऐसे उधार व कर्ज के लिए जैसी कि आशा थी, भारत ने कोई बाजार प्रदान नहीं किया, क्योंकि यहां के लोग इतने गरीब हैं और उनकी बचत इतनी कम है कि वे अपेक्षित पूंजी व्यय का थोड़ा-सा हिस्सा भी नहीं दे सकते। अतः निर्धन लोगों की सभी सरकारों की भांति, भारत सरकार को उन धनी देशों की ओर दौड़ना पड़ा जिनके पास उधार देने के लिए फालतू पूंजी थी। दुर्भाग्यवश, ये सभी देश स्वर्ण मान वाले थे। जब तक यह कहना संभव रहा कि स्वर्ण की अमुक मात्रा, चांदी की अमुक मात्रा के बराबर है तब तक इंग्लैंड का निवेशक इस बात के प्रति उदासीन रहा कि भारत सरकार की प्रतिभूतियां रुपया प्रतिभूतियां थीं या पाउण्ड प्रतिभूतियां थीं। परंतु चांदी के स्वर्ण मूल्य में गिरावट के कारण रुपया प्रतिभूति के स्वर्ण मूल्य में भी

  1. मि.जोकिन्स का साक्ष्य पृ.12 ‘‘ईस्ट इंडिया (सिविल सर्वेटस) पर प्रवर समिति 1890 का सी 327एच
  2. कलकत्ता सिविल वित्त समिति की रिपोर्ट, 1886 सिविल वित्त आयुक्त, 1887 की भी रिपोर्ट, जिसने

समिति के भंग होने के बाद रिपोर्ट को तैयार किया।