104 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
गिरावट आई। अतः एक समय जिसे सुरक्षित निवेश माना जाता था वह अब सुरक्षित नहीं रहा। इस स्थिति ने सरकार को, उसके असाधारण सार्वजनिक निर्माण के कार्यों के लिए वित्त व्यवस्था के मामले में कठिनाई में डाल दिया। तालिका XIII में दिए गए आंकड़े अध्ययन करने योग्य हैं।
अंग्रेजी निवेशक रुपया प्रतिभूतियों में निवेश नहीं करते थे। भारतीय रुपया प्रतिभूतियों के लिए महत्वपूर्ण ग्राहक हाथ से निकल गया था। भारतीय मुद्रा बाजार की प्रतिक्रिया अपर्याप्त थी। पाउंड प्रतिभूतियों को जारी करना उसका केवल एकमात्र विकल्प था, जिससे सरकार भारत में पूंजी को आकर्षित करने के लिए एक बड़े तथा अधिक सतत
खजाने को काम में लाने के योग्य हो सकती थी। परंतु चूंकि इससे स्वर्ण भुगतान के भार में वृद्धि होना आवश्यंभावी था, अतः सरकार की सबसे प्रबल रुचि, लंदन मुद्रा बाजार के आश्रय को कम करने में थी। परंतु चूंकि यह अपरिहार्य हो गया था, अतः इसे कुछ नियंत्रित ख्1, व सीमित रखा गया, जिसका परिणाम यह हुआ कि असाधारण सार्वजनिक निर्माण के प्रसार में प्रगति देश की आवश्यकताओं के अनुरूप अपेक्षित गति से नहीं हुई। विनिमय में गिरावट के परिणामस्वरूप, वित्तीय अव्यवस्था के प्रभाव भारत सरकार तक ही सीमित नहीं रहे थे। उनको उन नगर पालिकाओं तथा स्थानीय निकायों द्वारा भी तत्काल महसूस किया गया जो वित्तीय सहायता के लिए सरकार के ऊपर निर्भर थी। जब तक नकद रोकड़ से सरकार के खजाने परिपूर्ण रहे, तब तक उनका ‘‘सबसे लाभदायक तरीका’’ उस राशि के एक भाग को इन स्थानीय संस्थाओं को उधार देकर, उसका सदुपयोग करना था। क्योंकि उनका शुभारंभ तभी लार्डरिपन के शासनकाल की स्थानीय स्वशासन नीति के अंतर्गत हुआ था और उनको उस समय केवल एक प्रयोग के रूप में देखा जाता था, अतः उनकी कराधान तथा उधार लेने की शक्ति कठोर रूप में सीमित थी। इसके फलस्वरूप अस्थायी पेशगियों के द्वारा केन्द्र सरकार से यह वित्तीय सहायता उनके लिए असीम उपयोगिता का साधन थी। तथापि, जब विनिमय द्वारा लगातार हानि के कारण केन्द्रीय सरकार की नकद रोकड़ में कमी होने लगी तो इन सुविधाओं में सख्ती से कटौती की गई ख्2, जिससे इन संस्थाओं के स्थायित्व को ही उस समय खतरा हो गया जब उनको अपने विकास के लिए व फूलने-फलने के लिए और अपने आधार को मजबूत करने के लिए सब प्रकार की सहायता की आवश्यकता थी।
- ह्रासमान विनिमय की अवधि के दौरान, भारत के ऋण की स्थिति निम्न प्रकार थीः-
पाउंड में ऋण रुपये में ऋण
1873-74 के अंत में -41,117,617 66,41,72,900
1898-99 के अंत में 124,268,605 1,12,65,04,340
भारतीय मुद्रा समिति (1898) परिशिष्ट II पृष्ठ-179
- वित्तीय विवरण, 1876-77 पृष्ठ 94