3. रजत मानक और इसकी अस्थिरता के दोष - Page 121

106 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

­सैक्रेटरी ऑफ स्टेट को सम्बोधित करते हुए, भारत सरकार ने 2 फरवरी, 1886 की एक विज्ञप्ति में कहा ख्1, ःµ

‘‘10 हमें इस बात को दोहराने में कोई झिझक नहीं है कि पूर्ववर्ती पैराग्राफों में बताए गए तथ्य, भारतीय हित की दृष्टि से असहनीय हैं और जिन दोषों/बुराइयों को हमने गिनाया है, उनकी सूची समाप्त नहीं हुई है। चांदी के भविष्य के संबंध में अनिश्चितता भारत में पूंजी निवेश को हतोत्साहित करती है और हमें चांदी को अत्यधिक मूल्य पर लेने के अलग उसे उधार असंभव प्रतीत होता है।

‘‘इसके विपरीत, सीमांत तथा अकाल रेलवे का निर्माण करने का हमारा प्रस्ताव है और तटवर्ती तथा सीमांत रक्षा की हमने योजना बनाई है इनकी अनिवार्य आवश्यकता है और इन्हें अनिश्चित रूप से स्थगित नहीं रखा जा सकता ।

‘‘अतएव, हम या तो अपने पाउंड संबंधी दायित्वों को बढ़ाने के लिए बाध्य हैं। जिसके लिए अनेक आपत्तियां उठाई जा रही हैं या रेलवे के बिना काम चलाने के लिए बाध्य हैं। रेलवे की आवश्यकता देश के वाणिज्यिक विकास के लिए तथा आक्रमण और अकाल के प्रभावों से इसकी रक्षा करने के लिए है।

* * * * *

‘‘11. स्थानीय निकायों को, भारत में उधार लेने में जिन कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, उन कठिनाइयों की उपेक्षा नहीं की जा सकती। बम्बई तथा कलकत्ता की नगर पालिकाओं को सफाई में सुधार लाने के लिए बहुत धन की आवश्यकता है, परंतु चांदी के ऋण के लिए उन्हें जिस ऊंची दर पर ब्याज का भुगतान करना चाहिए उसका भार उनको खर्चीले निर्माण कार्य शुरू करने से रोकता है और हमें आपको यह याद दिलाने की आवश्यकता नहीं है कि सरकार के लिए हाल ही में, यह आवश्यक हो गया है कि यह कलकत्ता तथा बम्बई में गोदी (नौकागार) के निर्माण के लिए अपेक्षित धन उधार देने का कार्य हाथ में ले और कलकत्ता के पत्तन (बंदरगाह) आयुक्त ने जब सितम्बर 1885 में भारत सरकार द्वारा प्रत्याभूत 75 लाख रुपये के ऋण एकत्र करने का प्रयास किया तो निविदाओं की कुल राशि केवल 40,200 रुपये हुई और इस तुच्छ राशि के किसी भी भाग को सममूल्य पर नहीं दिया गया.......।’’

निजी खाते पर पूंजी के आयात व आदान में इसी प्रकार के कारणों से बाधा पड़ी जो देश के लिए बहुत हानिकारक सिद्ध हुई। इसके लिए सब ओर से आग्रह किया गया और यहां तक कि रॉयल कमीशन ख्2, ने भी यह सिफारिश की कि अकालों की पुनरावृत्ति से भारत में बार-बार थोड़े-थोड़े अंतराल पर विनाशलीला होती है। उससे

  1. देखिए 1886 का उद्धरण µ4868 पृष्ठ 8

  2. अकाल आयोग (फैमिन कमीशन) की 1880 की रिपोर्ट, भाग-2 सी 1880 की 2735, पृष्ठ 175-76