3. रजत मानक और इसकी अस्थिरता के दोष - Page 122

रजत मानक तथा इसकी अस्थिरता के दोष

107

बचने का एक मार्ग व तरीका भारत में विविध प्रकार के उद्योग लगाना है। किसी स्थायी लाभ को प्रदान करने के लिए ऐसा विविधता वाला औद्योगिक जीवन केवल मात्र पूंजीवादी आधार पर ही टिक सकता था। परंतु वह देश में देश की आवश्यकताओं के लिए पूंजी व धन के इतने बड़े मुक्त प्रवाह पर निर्भर था जो सभी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए अपेक्षित था। उस समय जैसी स्थिति थी, उसमें अंग्रेज निवेशक जो पूंजी का सबसे बड़ा प्रबंधक था, भारत में पूंजी के निवेश को एक जोखिम भरा कार्य समझता था। उसे यह भय था कि यदि एक बार पूंजी का फैलाव रजत (चांदी) मान वाले देश में हो जाए तो चांदी के मूल्य में गिरावट से, उसकी वसूली, जब स्वर्ण में ली जाएगी तो वह केवल अनिश्चित ही नहीं हो जाएगी बल्कि स्वर्ण के रूप में उसके निवेश के पूंजी मूल्य में जो कमी हो जाएगी। स्वर्ण स्वभावतः वह इकाई थी जिसमें उसने अपनी तमाम वापसियों तथा लागत व व्यय को मापा था। पूंजी के मुक्त अंतर्प्रवाह पर यह रोक निस्संदेह एक बहुत ही गंभीर बुराई थी जो विनिमय के अंकित मूल्य की दरार व बिगाड़ के कारण उत्पन्न हो रही थी।

स्वर्ण में भुगतान करने के दायित्व के कारण, विनिमय की गिरावट से हानि उठाने वाले लोगों का एक दूसरा समूह, भारत में सिविल सेवा के यूरोपीय सदस्यों का समूह था। जिस सरकार से उनका संबंध था, उस सरकार की भांति ही वे अपना वेतन चांदी में लेते थे, परंतु उन्हें अपने परिवारों को, जो प्रायः पीछे इंग्लैंड में ही छोड़ दिए गए थे धन स्वर्ण में भेजना पड़ता था। 1873 से पहले, तब उनके सामने ऐसी परिस्थिति नहीं थी परंतु जैसे ही रुपये के मूल्य में गिरावट आने लगी तो परिस्थितियां पूर्णतया बदल गयी थीं। चांदी के मूल्य में प्रत्येक गिरावट के साथ उनको स्वर्ण की उतनी राशि व मात्रा प्राप्त करने के लिए अपने निश्चित वेतन में से अपेक्षाकृत अधिक रुपयों का भुगतान करना पड़ता था। इसमें संदेह नहीं कि उनके धन में प्रेषण के मामले में उनको कुछ राहत दी जाती थी। सिविल सेवकों को, ‘सरकार के प्रति त्याग पर, अपनी रकम उस विनिमय दर पर भेजने की अनुमति दे दी जाती थी, जिसे ‘‘विनिमय की सरकारी दर कहते थे। ख्1, यह सच है कि बाजार दर तथा सरकार दर में कोई बहुत अधिक अंतर

  1. जैसा कि ईस्ट इंडिया (सिविल सर्वेंट्स) पर प्रवर समिति के समक्ष श्री वाटरफील्ड द्वारा स्पष्टीकरण

दिया गया, एच सी रेटन, 1890 का 327 प्र. 1905-1917, इसे पहले बार 1824 में संस्थापित किया

गया था और इसका हिसाब निम्न प्रकार से लगाया जाता था। इंडिया आफिस में प्रत्येक वर्ष दिसम्बर में

एक रुपया भारत में भेजने के खर्च का हिसाब लगाया जाता था, यह हिसाब लंदन में चांदी के बाजार

मूल्य पर आधारित होता था और भारत से एक रुपया लाने के खर्च का हिसाब (गणना) लंदन पर

बिलों के कलकत्ता में मूल्य के आधार पर की जाती थी। दोनों के बीच औसत निकाला जाता था और

उसे इंडिया आफिस और ब्रिटिश खजाने के बीच, आने वाले सरकारी वर्ष के लिए समयोजक दर के

रूप में लिया जाता था। यह एक सरकार द्वारा दूसरी सरकार के एजेंट के रूप में लिए गए भुगतानों या

ऐसे सौदों के संबंध में किया जाता थ। यद्यपि यह कभी-कभी विनिमय की बाजार दर से अधिक और

कभी-कभी कम होता था पर इसे प्रत्येक के लिए नए सिरे से निर्धारित किया जाता था और इसकी

एक ठीक औसत दर लगाई जाती थी।