रजत मानक तथा इसकी अस्थिरता के दोष
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नहीं था। फिर भी, सिविल सर्वेन्टस के लिए यह बात काफी महत्वपूर्ण थी कि उन्हें, सरकार की लागत पर 1862-90 ख्1, के वर्षों में औसतन अढ़ाई प्रतिशत का लाभ प्राप्त हुआ। सेना के कर्मचारियों को इसी प्रकार की राहत अपेक्षाकृत अधिक मात्रा में प्राप्त हुई, परंतु उनको राहत मिलने का तरीका अलग था। उनके वेतन का भुगतान यद्यपि रुपये में देय होता था पर उसका निर्धारण पौंड में होता था। यह सच है कि जो रॉयल वारंट उनके वेतन को निर्धारित करता था, वह उस उद्देश्य के लिए पौंड तथा रुपये के बीच विनिमय दर को भी निर्धारित करता था। परंतु हमेशा यह होता था कि वारंट द्वारा निर्धारित विनिमय दर, बाजार दर से अधिक होती थी। अतः सेना के कर्मचारियों को इस अंतर की क्षतिपूर्ति भारतीय राजकोष के खाते से कर दी जाती थी। ख्2, यदि तुलनात्मक दृष्टि से देखा जाए तो यह राहत उनके लिए कोई राहत नहीं थी। यद्यपि विनिमय की सरकारी दर या वारंट दर, विनिमय की बाजार दरों से बेहतर थी, परंतु फिर भी वे दरें इस विनिमय दर से बहुत कम थीं जिस दर पर वे 1873 से पहले अपने धन को प्रेषित किया करते थे। सरकार के ऊपर भार की तरह ही उनके ऊपर भी भार चांदी की गिरावट के साथ-साथ बढ़ गया और जैसे ही उनके ऊपर भार में वृद्धि हुई, उनका व्यवहार भी भयग्रस्त हो गया। अनेक लोग अभ्यावेदक हो गए थे। उन्होंने अपने अभ्यावेदनों में सरकार से मांग की कि विनिमय में उसको जो हानि होती है सरकार उसकी क्षतिपूर्ति पर्याप्त मात्रा में करे। ख्3, उन्होंने सरकार को यह चेतावनी दी ख्4, कि
‘‘जिन अनभिज्ञ व अनजान लोगों का विचार यह है कि वर्तमान वेतनों को कम करने से भारत को लाभ होगा ऐसा प्रतीत होता है वे यह नहीं समझ रहे हैं कि ऐसा कदम उठाने से घटाए गए वेतन पर काम कराना असंभव हो जाएगा और आवश्यकता को पूरा करने के लिए धन प्राप्त करने के अन्य तरीकों का सहारा लेना पड़ेगा।’’
इसमें संदेह नहीं, कि ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रारंभ के दिनों में ऐसी ही स्थिति थी जब सिविल सर्वेन्टस की ऊपर की आमदनी मोटी होती चली गई क्योंकि उनका वेतन कम होता था ख्5, और उनकी लूट खसोट को रोकने के लिए उनके वेतन में इतनी
वही-प्र. 1925-26
एफ एस 1887-88 पृष्ठ 39-40 यह खर्च निम्न प्रकार से थाः-
1847-75 6,40,000 रु.
1884-85 18,43,000
1885-86 4,00,000
1886-87 5,15,000
- भारतीय मुद्रा समिति, 1891 की रिपोट का परिशिष्ट 1ए पृष्ठ 185-90 तथा पृष्ठ 202, फॉर ‘‘मैमोरियल्स
ऑफ दि यूरोपियन सिविल सर्वेन्टस’’
- कर्नल हयूगस हैलट, एम.पी.दि. डेंप्रिसिएशन ऑफ दि रुपी (रुपये का अवमूल्यन)ः इट्स इफैक्ट ऑन
दि एंग्लों इंडियन आफिशियल-दि रांग एंड दि रिमेडी, लंदन, 1887, पृ.14 A
- प्रारंभ के यूरोपीय सिविल कर्मचारियों के लोभी व लूटने वाले व्यवहार तथा उनके कम वेतन के बीच
संबंध को क्लाइव ने हाउस ऑफ कामन्स में ईस्ट इंडिया जूडिकेचर बिल पर वाद-विवाद के दौरान 30
मार्च, 1772 को स्पष्ट किया था। हंसार्ड खंड 17, पृष्ठ 334-39