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रजत मानक तथा इसकी अस्थिरता के दोष

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उत्पादकों को हानि पहुंचाने वाली भी कोई बात नहीं थी। इस तथ्य को समझकर कि विनिमय दो मूल्य स्तरों का अनुपात था, यह बात समझ में नहीं आती कि अंग्रेज उत्पादक जिसको स्वर्ण मुद्राएं (सॉवरिन) तो कम मिलती थी, किन्तु उसकी क्रय शक्ति बहुत अधिक थी, और भारतीय की स्थिति भारतीय उत्पादक की तुलना में दयनीय थी जबकि भारतीय उत्पादक को रुपये तो अधिक मिलते थे किन्तु उसकी क्रय शक्ति कम थी। फिर भी प्रो. मार्शल का साम्यानुमान बहुत उपयुक्त था। यह मान लेना कि विनिमय की गिरावट के फलस्वरूप अंग्रेज उत्पादक को हानि होती थी और भारतीय उत्पादक को लाभ होता था, इस बात को मानने के समान था कि एक व्यक्ति एक जलयान की केबिन में हो तो केबिन की ऊंचाई दस फीट हो, और यदि वह जलयान एक द्रोणिका(गर्त) में बारह फीट नीचे डूब जाए तो उस व्यक्ति का सिर टुकड़े-टुकड़े हो जाएगा। इसमें भ्रम यह है कि उस व्यक्ति को जलयान से अलग कर दिया जाए, जबकि वास्तव में, जलयान तथा यात्री दोनों ही एक समय में समान शक्ति से प्रभावित होने के कारण दोनों में समान गति उत्पन्न की। उसी तरीके से, वही शक्ति भारतीय उत्पादक तथा अंग्रेज उत्पादक पर एक साथ क्रिया करती थी। क्योंकि विनिमय में परिवर्तन, दो देशों के साम्राज्य मूल्य स्तर में अधिक व्यापक परिवर्तन का ही एक अंग था। इस प्रकार से, अंग्रेज तथा भारतीय उत्पादक की स्थिति अच्छी या बुरी एक समान रूप में थी और इसमें केवल यह अंतर था कि अंग्रेज उत्पादक अपने से संबंधित व्यापार व लेनदेन में कम पटलों (काउंटरों) का प्रयोग करते थे और भारतीय उत्पादक बहुत सारे पटलों (काउंटरों) का प्रयोग करते थे। ख्1,

यह बात स्पष्ट है कि भारतीय उत्पादक के लिए आनुतोषिक (इनाम) तथा अंग्रेज उत्पादक के लिए जुर्माने(आर्थिक दंड) की स्थिति केवल तभी उत्पन्न हो सकती थी यदि इंग्लैंड में, स्वर्ण के रूप में चांदी की गिरावट, भारत में वस्तुओं (जिन्सों) के रूप में चांदी की गिरावट की अपेक्षा अधिक होती। ऐसा होने पर भारतीय उत्पादक, इंग्लैंड में चांदी के लिए अपने माल का विनिमय करके एक स्पष्ट लाभ कमा लेता और इस प्रकार एक ऐसा माध्यम प्राप्त कर लेता जिसका भारत में माल/वस्तुओं तथा सेवाओं पर अपेक्षाकृत और अधिक नियंत्रण होता। परन्तु वास्तव में, ऐसी कल्पना व मान्यता का कोई औचित्य नहीं हो सकता था। ऐसा कोई कारण नहीं था, कि चांदी का स्वर्ण मूल्य, सामान्य रूप में माल(जिन्सों) के स्वर्ण मूल्य से भिन्न दर पर गिरता या चांदी के मूल्यों में इंग्लैंड में तथा भारत में, बहुत भारी अंतर होता। आंकड़े यह दर्शाते हैं कि ऐसी पूर्व कल्पना निराधार नहीं थी। (देखिए, तालिका XXI )

  1. अध्याय 1 में चांदी के आयात संबंधी आंकड़े हैं। तथापि यह देखा जाएगा कि 1872-1893 के बीच की

अवधि मेंं भारत में चांदी के आयात ने चांदी के स्वर्णमूल्य का कितनी निकटता से अनुसरण किया।