3. रजत मानक और इसकी अस्थिरता के दोष - Page 133

118 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

दूसरा निष्कर्ष यह था कि विनिमय में गिरावट ने कुछ अन्य लोगों की तुलना में अंग्रेज उत्पादकों को चांदी का प्रयोग करने वाले देशों में उनके प्रतिद्वन्द्वियों से प्रतिस्पर्द्धा के लिए खुला छोड़ दिया था। क्या ऐसे निष्कर्षों के संबंध में यह कहा जा सकता है कि वे विनिमय की गिरावट से प्राप्त किए गए थे? यदि हम विनिमय के ”ास संबंधी नीरस कथन के पीछे जाएं, व इस कथन का अनुसरण करें और जानकारी प्राप्त करें कि चांदी के स्वर्णमूल्य का निर्धारण कौन सी वस्तु करती थी तो उपर्युक्त निष्कर्ष बिल्कुल तर्कसंगत प्रतीत नहीं होते हैं। यह कि सोने तथा चांदी के बीच अनुपात, स्वर्णमूल्य तथा रजत (चांदी) मूल्य के बीच अनुपात का केवल प्रतिलोभी होता था, इसे एक निश्चित व शंकारहित प्रस्ताव व तर्क-वाक्य के रूप में मानना चाहिए। इसलिए यदि चांदी का स्वर्ण मूल्य गिर रहा था तो इंग्लैंड में मूल्य की गिरावट एक अधिक सामान्य घटना का प्रतिरूप थी। अंग्रेजी मूल्यों को सोने में मापा जाता था और भारतीय मूल्यों में वृद्धि को चांदी में मापा जाता था। ”ासमान विनिमय की घटना की ऐसी व्याख्या से इस बात को समझना कठिन है कि यह निर्यात की वृद्धि करने में और आयात को कम करने में किस प्रकार सहायता कर सकती है। अंतर्राष्ट्रीय व्यापार उन सापेक्ष सुविधाओं द्वारा नियंत्रित होता है जो एक देश के पास दूसरे देश की तुलना में अधिक होती है और जिन शर्तों पर वह व्यापार चलता है, उन शर्तों को उसमें शामिल वस्तुओं के तुलनात्मक मूल्य द्वारा विनियमित किया जाता है। अतएव, यह बात स्पष्ट है कि इन वस्तुओं के तुलनात्मक मूल्य में परिवर्तनों के परिणाम के अलावा व्यापार के वास्तविक अर्थों में देशों के बीच परिवर्तन नहीं हो सकता। स्वर्ण के मूल्यों में चौतरफा गिरावट और उसके साथ चांदी के मूल्यों में चौतरफा वृद्धि होने से, मुद्रा संबंधी गड़बड़ में कोई चीज ऐसी नहीं थी जिसके विषय में यह कहा जा सकता कि उसने भारत को किसी वस्तु के निर्यात में वृद्धि करने के योग्य बनाया। केवल इस बात को छोड़कर कि भारत ने ऐसा अपने निर्यात को घटाकर या किसी और वस्तु के आयात को बढ़ाकर किया। ”ासमान विनिमय के प्रश्न के उसी प्रकार के विचार से यह परिणाम निकलता है कि धन/मुद्रा की ऐसी गड़बड़, एक व्यापार को दूसरे की अपेक्षा दबा नहीं सकी व उसके कारण एक व्यापार दूसरे व्यापार की अपेक्षा कम नहीं हो सका। यदि ”ासमान या आरोही (बढ़ता हुआ) विनिमय सामान्य मूल्यों के स्तर का केवल एक अभिव्यक्ति मात्र था, तो समस्त वस्तुओं के उत्पादक इससे समान रूप में प्रभावित हुए थे। इसका कोई कारण नहीं कि विनिमय की दर में गिरावट से छुरी कांटे(कटलरी) के व्यापार की अपेक्षा रूई का व्यापार या गेहूं का व्यापार अधिक प्रभावित नहीं हो।

केवल यही नहीं कि सामान्य या किन्हीं विशेष वस्तुओं के संबंध में वर्तमान व्यापार संबंधों को अव्यवस्थित करने या नष्ट करने के लिए विनिमय की गड़बड़ की कोई बात नहीं थी, बल्कि इसमें भारतीय उत्पादकों को लाभ पहुंचाने वाली तथा अंग्रेज