रजत मानक तथा इसकी अस्थिरता के दोष
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यह बात बिल्कुल स्पष्ट थी कि यदि चांदी में गिरावट जिन्सों/वस्तुओं की अपेक्षा अधिक तेजी से हो रही थी और भारत में चांदी की कीमत इंग्लैंड में चांदी की कीमत की तुलना में कम थी तो हमें इस बात का प्रमाण मिलना चाहिए था कि उस समय चांदी का इंग्लैंड से भारत में असामान्य रूप से प्रवाह हो रहा था, पर वास्तविकता क्या थी? वास्तविकता केवल यही नहीं थी कि उस समय भारत में चांदी का कोई असाधारण अन्तर्वाह नहीं हुआ बल्कि 1871-93 के दौरान चांदी का भारत में जो आयात हुआ था वह उस अवधि से पूर्व के बीस वर्षों की तुलना में बहुत कम हुआ था। ख्1, यह बात इस तथ्य से पूर्णतया स्पष्ट हुई कि भारत में चांदी का मूल्य उतना ही था जितना भारत से बाहर था और इसके फलस्वरूप भारतीय उत्पादक को अपने व्यापार पर आनुतोषिक (इनाम) मिलने का बहुत ही कम अवसर था।
यद्यपि, इसे प्रश्न का पूर्व दृष्टिकोण कहा जा सकता है पर भारतीय उत्पादक को यह निश्चय व विश्वास था कि उसकी समृद्धि उस आनुतोषिक (इनाम) के कारण थी जो उसे मिलता था। चूंकि उसकी स्थिति ऐसी थी, अतः उसके लिए भारतीय मुद्रा में किसी प्रकार के सुधार का विरोध करना स्वाभाविक था। क्योंकि जिस पतनोन्मुख व ”ासमान विनिमय को सरकार अभिशाप मानती थी, उसे भारतीय उत्पादक वरदान समझता था। परंतु भारतीय उत्पादक का दृष्टिकोण चाहे जितना युक्तियुक्त था पर उसके प्रति अधिक सहानुभूति महसूस न होती यदि उसके साथ सामान्य रूप में माना जाने वाला यह विचार जुड़ा होता कि आनुतोषिक इनाम निर्यात व्यापार से उत्पन्न हुआ, जिससे यह इस लोकप्रिय धर्म सिद्धांत (विश्वास का एकसूत्र) बन गया कि विनिमय की गिरावट समूचे राष्ट्र के लिए लाभ का साधन है। अब क्या यह बात सच थी कि आनुतोषिक/ इनाम की उत्पत्ति निर्यात व्यापार से हुई थी? यदि ऐसा होता तो विनिमय की प्रत्येक गिरावट पर आनुतोषिक मिलना चाहिए था। परन्तु मान लिया, कि चांदी का अवमूल्यन (मूल्य ”ास यदि भारत में, यूरोप में उसके अवमूल्यन होने से पहले हो जाता, तो इस प्रकार विनिमय में जो गिरावट आई थी क्या उससे भारतीय निर्यातक को आनुतोषिक/ इनाम का लाभ मिल सकता था? जैसा कि ऊपर कहा गया है, भारतीय निर्यातक को आनुतोषिक/इनाम या लाभ प्राप्त होने का अवसर केवल तभी मिल सकता था, यदि वह अपने उत्पादन के बदले में मिलने वाली चांदी से भारत में और अधिक माल या सेवाएं खरीद सकता। यदि इसे सरल भाषा में कहा जाए तो उसके उत्पादन की कीमत तथा उसके परिव्यय की कीमत के बीच जो अंतर था वह उसका आनुतोषिक था। इस बात को ध्यान में रखकर हम विश्वासपूर्वक यह कह सकते हैं कि पहले, भारत में चांदी का अवमूल्यन होने के मामले में, भारतीय विनिमय में ऐसी गिरावट के कारण उसको अपने व्यापार पर आनुतोषिक मिलने के बजाए जुर्माना मिलता। ऐसी स्थिति में भारत के निर्यातकों को यह पता था कि यद्यपि भारतीय विनिमय अर्थात् चांदी के स्वर्ण
- देखिए इन्फ्रा, अध्याय-4