122 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
मूल्य में गिरावट आ गई थी तो भी इंग्लैंड में स्वर्ण मूल्यों का भारत में रजत मूल्यों के साथ जो अनुपात था, उसमें अपेक्षाकृत अधिक गिरावट आ गई थी अर्थात् उसे अपने उत्पादन की जो कीमत मिलती थी वह उसके द्वारा किए गए परिव्यय(खर्च) से कम होती थी। यह बात बिल्कुल प्रमाणित नहीं है कि चांदी का मूल्य भारत में गिरने से पहले यूरोप में गिर गया था। ख्1, परन्तु यदि चाहे ऐसा हुआ भी हो तो भी विनिमय की गिरावट से दंड (जुर्माने) की संभावना से यह सिद्ध होता है कि यदि कोई आनुतोषिक था तो वह निर्यात व्यापार पर अपने में आनुतोषिक नहीं था बल्कि देश के अंदर मूल्यों के सामान्य स्तर तथा विशेष माल तथा सेवाओं के मूल्यों के बीच असामंजस्य का परिणाम था और चाहे देश का कोई निर्यात व्यापार न भी होता तो भी वह असामंजस्य विद्यमान रहता।
इस प्रकार, आनुतोषिक का मिलना मुद्रा के सामान्य अवमूल्यन का केवल एक संयोगमात्र था। उसके अस्तित्व को इसलिए महसूस किया गया क्योंकि भारत में समस्त वस्तुओं तथा सेवाओं की कीमत में उसके समान वृद्धि नहीं हुई। यह बात सभी जानते हैं कि किसी एक समय में कुछ वस्तुओं के मूल्य में तो वृद्धि होगी जबकि सामान्य मूल्यों के स्तर में गिरावट आएगी। इसके विपरीत जब सामान्य मूल्य स्तर में वृद्धि हो रही हो तो कुछ वस्तुओं के मूल्य में गिरावट आ रही होगी। परन्तु ऐसी विपरीत चाल कभी-कभार ही होती है अधिकतर ऐसा होता है कि यद्यपि कुछ वस्तुओं तथा सेवाओं के मूल्य उसी एक दिशा में चलते हैं, परंतु वे सामान्य मूल्य स्तर के उतार चढ़ाव की गति के साथ-साथ नहीं चलते। यह बात प्रसिद्ध है कि जब सामान्य मूल्यों में गिरावट आती है तो प्रत्येक नियोक्ता के कुल परिव्यय में सबसे बड़ी मदों, वेतन तथा अन्य निश्चिय आय में उसी अनुपात में गिरावट नहीं आती। और जब सामान्य मूल्यों में वृद्धि होती है तो उन सामान्य मूल्यों में वृद्धि उसी तेज गति से नहीं होती बल्कि उनमें कम वृद्धि होती है वे इस दृष्टि से पीछे रहते हैं। ऐसा भारत जैसे रजतमान वाले देश में तथा इंग्लैंड जैसे स्वर्णमान वाले देश में 1873-1893 की अवधि के दौरान हो रहा था। (चार्ट-4 देखिए)। इंग्लैंड में मूल्यों में गिरावट आ गई थी, परंतु वेतन में उस हद तक गिरावट नहीं आई थी। भारत में मूल्यों में वृद्धि हो गई थी, परंतु वेतन में उस हद तक वृद्धि नहीं हुई थी। अंग्रेज निर्माता को अर्थ दंड देना पड़ रहा था, यद्यपि वह उसके भारतीय प्रतिद्वन्द्वी के किसी काम के कारण नहीं था बल्कि इस का कारण था कि उसके कर्मचारियों का वेतन तो वही रहा जबकि उसके उत्पादनों के मूल्य में कमी हो गई थी। भारतीय उत्पादक को यदि कोई लाभ मिला तो वह लाभ इसी कारण नहीं मिला था कि उसकी पूर्ति करने वाला अंग्रेज प्रतिद्वन्द्वी था बल्कि इस कारण मिला था कि उसको अधिक वेतन नहीं देना पड़ा था, हालांकि उसके उत्पादनों के मूल्य में वृद्धि हो गई थी।
अतएव, इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि ”ासमान विनिमय से स्थापित व्यापार संबंधों में कोई गड़बड़ नहीं हो सकती थी या उससे अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में शामिल