अध्याय-4
स्वर्ण मानक की ओर
स्थिर आर्थिक स्थिति की स्थापना स्वाभाविक रूप में मूल्य के एक सामान्य मानक के पुनरुद्धार पर बहुत निर्भर थी। उसका उद्देश्य सीधा-सादा था, किन्तु उसकी उपलब्धि किसी प्रकार भी एक आसान बात नहीं थी। उसे व्यवहार में लाने के लिए सबसे पहले दो मार्ग खुले प्रतीत होते थे। एक तरीका एक सामान्य धातु को मुद्रा के रूप में अपनाना था चूंकि विश्व के सभी मुख्य देशों ने स्वर्ण-मान को अपना लिया था अतः इसका अर्थ यह था कि रजत-मान वाले देशों को अपने मानक को स्वर्ण के पक्ष में त्याग देना चाहिए। दूसरा मार्ग स्वर्ण तथा रजन-मान वाले देशों को अपनी मुद्रा रखने देना तथा उनकी बीच विनिमय का एक निश्चित अनुपात स्थापित करने देना था जिससे दो धातुओं के मूल्य का एक समान मानक बन जाए।
भारतीय मुद्रा के सुधार के लिए आन्दोलन का इतिहास, इन दो आन्दोलनों का इतिहास है। स्वर्ण-मान की शुरुआत के लिए किया गया आन्दोलन पहला आन्दोलन था जिसने पहले पैर जमाए। 1868 की अधिसूचना की असफलता के संबंध में यह कहा जा सकता है कि वह एक नीति की असफलता थी, परन्तु भारत में स्वर्ण मुद्रा के लिए आन्दोलन को जो छठे दशक में आरंभ हुआ था वह देश के बाहर पूर्ण रूप में नहीं किया गया था। इस आन्दोलन में अब भी जान थी यह बात इस तथ्य से दिखाई देती है कि सर आर. टिम्पल ने चार वर्ष बाद 15 मई, 1872 को एक ज्ञापन ख्1, में उस समय पुनरुज्जीवित किया गया जब वह भारत का वित्त मंत्री बना। जिस महत्वपूर्ण विषय में उसका अपने पूर्ववर्ती वित्त मंत्रियों से मतभेद था, वह यह था कि उसके पूर्ववर्ती वित्त मंत्री सावरेन को भारत में स्वर्ण मुद्रा की प्रमुख यूनिट बनाना चाहते थे जबकि वह भारतीय स्वर्ण मुद्रा ‘‘मोहर’’ को वह स्थान प्रदान करना चाहता था। उसके पूर्ववर्ती मंत्रियों ने वैसा क्यों नहीं किया, यह बात थोड़ी आश्चर्यजनक है जबकि सॉवरेन का सही रूप में मूल्य निर्धारण की समस्या थी और इस समस्या से वे बहुत घबरा गए थे।
- रिपोर्ट ऑफ द इंडियन करेंसी कमेटीµ1898 के परिशिष्ट 1, सं. 12 में मुद्रित ।