4. स्वर्ण मानक की ओर - Page 147

132 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

जब इस बात को याद किया जाता है कि भारतीय टकसाल पिछले बहुत लम्बे समय से ‘‘मोहर’’ जारी कर रही थी जिसका सही-सही मूल्य निर्धारण करना संभव था और उसे साथ ही भारत में स्वर्ण मुद्रा की प्रमुख यूनिट बनाया जा सकता था। परंतु उन्होंने ऐसा नहीं किया, इस बात का केवल एक ही कारण हो सकता है कि वे एक तीर से दो शिकार करना चाहते थे। भारत में स्वर्ण मुद्रा का समर्थन करने के अलावा, सॉवरेन को अपनाने का हिसाब भी उस समय प्रचलित सिक्कों की अंतर्राष्ट्रीय एकरूपता के आंदोलन को बढ़ावा देने के लिए लगाया गया था। इस दृष्टि से ‘‘मोहर’’ की उपयोगिता, सॉवरेन की उपयोगिता की तुलना में निम्न थी। परन्तु जब रिचार्ड टैम्पिल घटनास्थल पर आए तो अंतर्राष्ट्रीय रूप में अपनाए जाने वाले कुछ सार्वभौम सिक्कों की संभावना तेजी से लुप्त होती प्रतीत हुई। हर स्थिति में, अंतर्राष्ट्रीय सिक्कों पर ब्रिटिश आयोग जिसके अध्यक्ष लार्ड हैलिफैक्स थे की रिपोर्ट में ब्रिटिश सॉवरेन के मान में किसी भी प्रकार के परिवर्तन न करने की घोषणा कर दी गई थी। ऐसी व्यापक समस्या के लिए किसी भी विचार से अबाधित, सर आर. टैम्पिल ने मुक्तरूप से सॉवरेन के स्थान पर ‘‘मोहर’’ को मुहा की यूनिट के रूप में अपनाने की सिफारिश की। ख्1,

उसने लिखा, ‘‘हमारे पास सोने के टुकड़े हैं, जो क्रमशः पंद्रह, दस तथा पांच रुपये मूल्य के हैं और हम यह विश्वास करते हैं कि जहां तक स्वर्ण तथा रजत के सापेक्ष मूल्य का सम्बन्ध है, ये इन कई रकमों को बिल्कुल सही-सही प्रस्तुत करते हैं.......... कि.......... ‘‘हमें स्वर्ण के सिक्कों को अप्रतिबंधित राशि के लिए वैध मुद्रा घोषित करने का प्रथम अवसर प्राप्त करना चाहिए कि सोने के टुकड़ों का रुपये के साथ निर्धारित सम्बन्ध जारी रहना चाहिए, कि एक समय के लिए रुपये को एक असीमित राशि के लिए वैध मुद्रा बने रहने की अनुमति देना आवश्यक हो सकता है, इसमें अस्थायी रूप में दोहरे मानक की कठिनाई होगी, कि दोहरे मानक का संक्रातिकाल यथासंभव कम से कम होना चाहिए। चांदी को घटाकर एक प्रतीक सिक्का बना दिया जाए और उसे केवल एक कम राशि तक की वैध मुद्रा बना दिया जाए कि सोना अंततः एक वैध मानक होना चाहिए।’’

उसने 10 रुपये का 120 ग्रेस मानक अर्थात् 110 ग्रेन शुद्ध सोने के लिए अनुपात प्रस्तावित किया ख्2, परन्तु वह सर चार्ल्स ट्रेवेलियान की उतावलेपन में भागीदार नहीं बना ख्3, ।

  1. फिर भी, उसने कहा, ‘‘सॉवरेन को 10 रुपये तथा चार आने के लिए एक वैध मुद्रा बनाने पर मुझे कोई

आपत्ति नहीं होगी। किन्तु यदि सॉवरेन 10 रुपये का तथा उसके भाग का हो तो उसे चांदी में बदलने

के लिए एक मुद्रा के रूप में प्रयोग करने में असुविधा होगी और यदि इस आपत्ति पर जोर दिया जाता

तो मैं सॉवरेन को वैध मुद्रा घोषित करने के लिए दबाव न डालता। परन्तु हमें किसी भी परिस्थिति में

सॉवरेन को वर्तमान मूल्य निर्धारण पर अपने खजानों (कोषागारों) में प्राप्त रहना चाहिए।’’ 2. यह 15ः1 का अनुपात था जो स्वर्ण का थोड़ा-सा अवमूल्यन था।

  1. सुनीर अध्याय-1