अध्याय-5
स्वर्ण मानक से स्वर्ण विनिमय मानक तक
एक बार ऐसा लगता था कि अवमूल्यित रुपये की समस्या का संतोषजनक ढंग से समाधान हो गया है। शताब्दी के चतुर्थांश जैसी दीर्घ अवधि में चिंताओं और कठिनाइयों की क्षतिपूर्ति पूर्णरूपेण उस समाधान से संभव नहीं हुई जिसका कि विगत अध्याय में वर्णन किया जा चुका है। लेकिन अस्वाभाविक घटनाओं के कारण, मूल रूप से जो कार्यशैली निर्धारित की गई थी वह क्रियान्वित होने से पूर्व ही समाप्त हो गई। इसके स्थान पर भारतीय मुद्रा के प्रचलन का सिलसिला प्रारंभ हुआ जोकि इसका बिल्कुल उलटा था। फाउलर समिति की सिफारिशों के लगभग तेरह वर्ष के उपरांत विधायी स्वीकृति प्रदान की गई। भारतीय वित्त और मुद्रा के विषय में चेम्बरलेन आयोग ने कहाः
‘‘इस तथ्य के रहते कि सन् 1898 की समिति की सिफारिशों को सरकार
ने मान लिया था और उन पर कार्यवाही प्रारंभ की, फिर भी पूरी तरह से आज
भी भारतीय मुद्रा पद्धति में असमानता विद्यमान है जैसी कि समिति ने सिफारिश
की थी, जबकि विनिमय को नियंत्रित करने वाली कार्य संरचना में पर्याप्त समान
गुण मौजूद हैं, उन सिफारिशों के साथ जो समिति को श्रीमान ए.एम. लिंडसे ने
प्रस्तुत किए थे।’’ ख्1,
यहां पर यह याद रखना होगा ख्2, कि मि. लिंडसे की योजना में भारतीय मुद्रा को पूरी तरह रुपया-मुद्रा होना था। सरकार को हर मामले में स्वर्ण के बदले रुपये लौटाने थे और केवल विदेशी प्रेषण के मामले में रुपयों के बदले स्वर्ण देना था। इस योजना को दो कार्यालयों के माध्यम से कार्यरूप में परिणित करना था- एक कार्यालय लंदन में होना था और दूसरा भारत में। रुपयों की जरूरत पड़ने पर लंदन के कार्यालय को ड्राफटों की बिक्री करनी थी और भारत स्थित कार्यालय को स्वर्ण की आवश्यकता पड़ने पर ड्राफटों की बिक्री करनी थी। यह आश्चर्य की बात है कि भारत में आज
रपट, पी.पी. कमांड 9068 (1913) पृ.13
देखें अध्याय- IV