6. विनिमय मानक की स्थिरता - Page 204

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अध्याय-6

विनिमय मानक की स्थिरता

यह स्मरणीय बात है कि जब भारतीय टकसालों में मुक्त रूप से चांदी के सिक्के ढालना बंद किया गया तो उस समय देश में दो दल थे, एक जो इसके पक्ष में था और दूसरा जो बंद किए जाने का विरोधी था। रुपयों में गिरावट आने के कारण सरकार बड़ी लज्जाजनक स्थिति में थी और इसलिए वह टकसालें बंद करने को उत्सुक थी ताकि स्वर्ण की अदायगी के बोझ से राहत पाने के लिए वह रुपये की कीमत बढ़ा सके। दूसरी ओर उत्पादक हित यह जोर डाल रहे थे कि रुपये का मूल्य बढ़ने से भारत के व्यापार और उद्योग पर कुठाराघात होगा। यह तर्क दिया जा रहा था कि 1873.93 के बीच भारतीय उद्योग ने दिन दूनी और रात चौगुनी जो प्रगति की थी उसका एक कारण यह था कि वरदान स्वरूप विनिमय दर गिरने से भारतीय निर्यात व्यापार को प्रोत्साहन मिला था। यदि टकसाल बंदी से रुपये की गिरावट रोकी गई तो अन्देशा है कि इससे अवश्य ही भारतीय व्यापार को दोनों तरफ से नुकसान पहुंचेगा। इससे भारत के मुकाबले चांदी का उपयोग करने वाले देशों को प्रोत्साहन मिलेगा और उससे भारत को वह प्रोत्साहन मिलना बंद हो जाएगा जो उसे विनिमय में गिरावट के कारण स्वर्ण का उपयोग करने वाले देशों के मुकाबले मिलता था।

सिद्धांततः तो इन आशंकाओं को गलत सिद्ध किया जा चुका है। इसलिए यह देखना रुचिकर होगा कि बाद के इतिहास ने भी इसका समर्थन कर दिया कि यह सिद्धांत ठीक था। रुपये की गिरावट रोकने के बावजूद भारत का व्यापार न तो स्वर्ण प्रतिमान वाले इंग्लैंड जैसे देश से कम हुआ और न ही चांदी के प्रतिमान वाले देश चीन से। अगली तालिकाओं में दिए गए आंकड़े इसकी उल्टी बात का पर्याप्त प्रमाण देते हैंःµ