194 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
है कि व्यापार की दशा अच्छी इसीलिए थी क्योंकि मुद्रा बुरी थी। 1873 और 1893 के बीच भारत का व्यापार इसलिए फला-फूला क्योंकि उसे यह इनाम स्वरूप मिल गया था। परंतु यह इनाम भारतीय मजदूर के लिए तो दंड स्वरूप रहा क्योंकि उसके वेतन इतनी तेजी से नहीं बढ़े जितनी तेजी से कीमतें बढ़ीं। इसलिए उस अवधि की भारतीय समृद्धि उत्पादन पर आधारित नहीं थी बल्कि मुद्रा स्फीति के फलस्वरूप हुई लूट-पाट के कारण थी।
इसी तरह यह बात भी बिना किसी दुविधा के स्वीकार नहीं की जा सकती कि नई मुद्रा वास्तव में अच्छी ही है क्योंकि इसने स्वर्ण भुगतान का बोझ कम कर दिया है और भारतीय करदाता को राहत दी है। इस विचार से इस बारे में गलत धारणा बनती है कि गिरती विनिमय दर की अवधि में भारत के लिए स्वर्ण भुगतान का सही स्रोत कौन-सा है। यह बात आमतौर पर कही जाती है कि स्वर्ण भुगतान का बोझ इसलिए पड़ा कि चांदी का स्वर्ण-मूल्य कम हो गया था। इस धारणा का तात्पर्य यह निकलता है कि भारत यदि स्वर्ण प्रतिमान का देश होता तो इस भारी बोझ से बच सकता था। पर यह बात सिद्ध करना भी जरूरी नहीं कि यह धारणा कितनी गलत है। ख्1, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि स्वर्ण प्रभुगतान के बढ़े हुए मूल्य के कारण भारत को अतिरिक्त बोझ उठाना पड़ा। परंतु जो बात अच्छी तरह नहीं समझी जाती वह यह है कि यह बोझ तो सभी स्वर्ण ऋणदाताओं पर पड़ा, चाहे उन्होंने स्वर्ण प्रतिमान अपनाया या चांदी प्रतिमान। इस संदर्भ में स्वर्ण तिमान वाले देश आस्ट्रेलिया की दशा चांदी प्रतिमान वाले देश भारत से भिन्न नहीं थी। जहां तक स्वर्ण ऋणी के देश थे, उन्हें उसी कारण से कष्ट झेलने पड़े अर्थात् उस प्रतिमान की मूल्य वृद्धि हो गई जिसमें उनके ऋण आंके जाते थे। इस बात में उनकी स्थिति पर कोई अंतर नहीं पड़ा कि एक ने ऋण स्वर्ण में चुकाया और दूसरे ने चांदी के सिवाय इस बात के कि चांदी में ऋण भुगतान करने के कारण एक ऐसा अपवर्तक (रिफ्रेक्टरी) माध्यम मिल गया जिससे यह पता चलना संभव हो गया कि उस पर कितना बोझ पड़ा है। चांदी में गिरावट के कारण भारत पर स्वर्ण भुगतान का बोझ नहीं बढा अपितु इससे तो यह आंका जा सका या मापा जा सका कि उस पर कितना बोझ बढ़ है। रुपयों में गिरावट पर रोक लग जाने को इस बात का प्रथम दृष्टि में ही कारण नहीं माना जा सकता कि करदाता को राहत मिली है और इसलिए यह मुद्रा प्रणाली की मजबूती का प्रमाण है। यह संभव है कि इस लाभ के लिए भारी कीमत अदा की गई हो।
यद्यपि चेम्बरलेन कमीशन पर इस बात का अनुकूल प्रभाव पड़ा कि विनिमय प्रतिमान के अंतर्गत व्यापार बढ़ा और सरकारी वित्त में उठाव आया, तथापि चेम्बरलेन
- देखें गोल्ड और सिल्वर कमीशन, 1886 के सम्मुख प्रो. मार्शल का साक्ष्य प्रश्न 10. 140-50