6. विनिमय मानक की स्थिरता - Page 215

200 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

कम उसके वास्तविक मूल्य (इनट्रिंजिक मूल्य)स्तर तक नहीं पहुंचेगा कि रुपये का सामान्य मूल्य से अधिक हो जाए। चांदी की कीमत पर रुपये का वास्तविक मूल्य

तालिका XXXII

विनिमय दरें, कलकत्ता पर लंदन की (नेशनल बैंक ऑफ इंडिया से)

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उसके सामान्य मूल्य के बराबर होना था, वह था 43 पैंस प्रति औंस। जब तक रुपये का वास्तविक मूल्य इसके अंकित मूल्य से अधिक था, अर्थात् चांदी की कीमत 43 पैंस से अधिक नहीं बढ़ी, तब तक रुपये के मुद्रा के रूप में प्रचलन में रहने को कोई

खतरा पैदा नही हुआ। पर जब चांदी का मूल्य उससे अधिक बढ़ गया तो रुपया मुद्रा के रूप में प्रचलन में नहीं रहा बल्कि तुरंत उसे पिघलाया जाने लगा। सितम्बर 1904 से दिसम्बर 1907 की छोटी सी अवधि के अतिरिक्त 1872 से ही चांदी के स्वर्ण मूल्य में घटने की उल्लेखनीय प्रवृत्ति दिखाई दी। इसका मूल्य लगातार और स्थिरता से इतना घटा कि आमतौर पर यह माना जाने लगा कि कम कीमतें तो बरकरार बनी रहेंगी और यह विचार इतना बल पकड़ गया कि विनिमय प्रातिमान के निर्माताओं ने इस आकस्मिकता के बारे में सोचा ही नहीं था कि चांदी की कीमत 43 पैंस से भी बढ़ जाएगी। इसकी इतनी कम कल्पना की गई थी कि भारतीय मुद्रा पर बनी कमेटियों और कमीशनों के सामने किसी भी गवाह ने इस आधार पर इस प्रतिमान की आलोचना नहीं की थी। परंतु अनहोनी भी हो सकती है। 1916 के बाद ऐसी अनहोनी हुई और