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विनिमय मानक की स्थिरता

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बिल्कुल अचानक हुई। 10 फरवरी 1914 को स्टैंडर्ड शुद्धता वाली चांदी की प्रति औंस यद्यपि 1916 में इसी तारीख को बढ़कर यह 27 पैंस हो गई तथापि यह भी रुपये के नकद कीमत 26 5/8 पैंस थी जो 10 फरवरी 1918 को गिरकर 22 11/16 पैंस हो गई। पिघलाव बिन्दु से नीचे थी। तथापि अंत में उल्लिखित तारीख के बाद यह बेहद तेजी से बढ़ी। 9 फरवरी 1917 को यह बढ़कर 37 5/8 पैंस हो गई_ 8 फरवरी 1918 को यह 43 पैंस हो गई और 1919 में उसी तारीख को 48 7/16 पैंस हो गई। और इस तरह रुपये के पिघलाव बिन्दु से काफी बढ़ गई। परंतु 11 फरवरी 1920 को तो इसके सारे रिकार्ड टूट गए जब इसका मूल्य बढ़ कर 89 1/2 पैंस प्रति स्टैंडर्ड औंस हो गया।

अंकित मूल्य के मुकाबले रुपये का वास्तविक मूल्य बढ़ने से एक दम यह समस्या पैदा हो गई कि रुपये का प्रचलन बरकरार कैसे रखा जाए। इस समस्या के हल के दो तरीके दिखाई देते थे। एक तो यह था कि रुपये की शुद्धता घटा दी जाए और दूसरा यह था कि इसकी स्वर्ण दर या सममूल्यता बढ़ा दी जाए। अन्य जितने भी देशों के सामने ऐसी समस्या आई, उन्होंने अपनी चांदी की मुद्रा के बारे में पहला तरीका अपनाया। यह तरीका 1904-07 की अवधि में फिलीपींस, जलडगरूमध्य के उपनिवेश और मेक्सिको में सफलतापूर्वक अपनाया गया। इन वर्षों में इन देशों में चांदी का मूल्य बढ़ने से यही समस्या पैदा हो गई थी। ख्1, परंतु सैक्रेटरी ऑफ स्टेट ने दूसरा तरीका अपनाया हर बार चांदी की कीमत बढ़ने के साथ-साथ रुपये की दर बदलते गए। चांदी की कीमतों में परिवर्तन के साथ-साथ रुपये की कीमतों में जो फेरबदल किए गए, वे नीचे की सारणी में दिए गए हैःµ

तालिका XXXIII

#i;s dh nj esa ifjorZu dh rkjh[k­ leewY; esa ifjorZu ­
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3 tuojh 1917­
28 vxLr 1917­
12 vizSy 1918­
13 ebZ 1919­
12 vxLr 1919­
15 flrEcj 19179
22 uoEcj 1919­
12 fnlEcj 1919­
f'kfyax iSal ­
1 41@2­
1 5­
1 6­
1 8­
1 10­
2 0­
2 2­
2 4­
  1. देखें ई. डब्ल्यू. केमेरर कृत मॉडर्न करेंसी रिफार्म्स, 1916 पृष्ठ 349-54, 445-49 और 535-47