विनिमय मानक की स्थिरता
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इस तथ्य का पता लगाने के लिए लंदन की विनिमय दर कोई मार्गदर्शक नहीं है क्योंकि रुपये का मूल्य 2 शिलिंग स्वर्ण है न कि 2 शिलिंग स्टर्लिंग। यदि स्वर्ण और स्टर्लिंग समकक्ष होते, तब तो और बात थी। परन्तु युद्ध के दौरान मुद्रा वस्तुतः अपरिवर्तनीय हो गई थी और स्वर्ण के रूप में पौंड स्टर्लिंग का मूल्य ”ास हो गया था। इसलिए हमें मानक के रूप में एक ऐसी मुद्रा को लेना पड़ेगा जो स्वर्ण के साथ सममूल्य पर रही थी। ऐसी मुद्रा अमरीकी डालर थी। इसलिए न्यूयार्क की विनिमय दर रुपये का स्वर्ण मूल्य मापने के लिए अधिक सहायक होती बजाय लंदन की स्टर्लिंग दर के। हम मापने के लिए रुपये-स्टर्लिंग की वास्तविक दर का भी उपयोग कर सकते थे और उसकी तुलना स्टर्लिंग की उस राशि से करते जितना एक रुपया
खरीद सकता और 11.30016 ग्रेन शुद्ध स्वर्ण के सममूल्य होती और उसे न्यूयार्क और लंदन के बीच विद्यमान विपरीत दर द्वारा सही कर लिया जाता। ख्1,
विनिमय के सममूल्य की तुलना करने से लंदन या न्यूयार्क में वास्तविक विनिमय दर से पता चलता है कि रुपये में गिरावट आई है जो वास्तव में आश्चर्यजनक बात है। (देखें तालिका XXXIV )।
इसी के साथ रुपये के बाह्य स्वर्ण मूल्य तथा सावरेन तथा बार गोल्ड के संदर्भ में इसके आंतरिक मूल्य पर भी विचार कीजिए। (देखें तालिका XXXV )µ
इन तालिकाओं पर कोई टिप्पणी करने की जरूरत नहीं है। रुपया न केवल 2 शिलिंग (स्वर्ण) से बहुत दूर है, बल्कि 1 शिलिंग 4 पैंस स्टर्लिंग के निकट भी नहीं है।
क्या ये तथ्य इस बात का अकाट्य प्रमाण नहीं है कि विनिमय प्रतिमान बिल्कुल व्यर्थ है? जो प्रणाली स्वर्ण के रूप में अपना मूल्य नहीं बनाए रख सकती, जिसकी इससे आशा की जाती है, तो उसे एक मजबूत मुद्रा प्रणाली कैसे समझा जा सकता है? इस प्रणाली के कार्य करने से कहीं न कहीं कोई ऐसी कमजोरी है जिससे समय-समय पर सब कुछ बिगड़ जाता है और प्रणाली काम करना बंद कर देती है। 1893 में रुपये में गिरावट आई या यह सममूल्य से नीचे गिर गया और 1900 तक
- इसके हिसाब लगाने का सूत्र इस प्रकार हैµ
यदि ‘ X ’ पैंस=1 रुपया= 11.30016 ग्रेन शुद्ध स्वर्ण
23.22 ग्रेन शुद्ध स्वर्ण =डालर
‘डी’ डालर = 1 पौंड स्टर्लिंग=240 पैंस
11.30016 × 240 11.680
तब X ................................... = ..................... पैंस
23.22 × डी डी
देखिए रशफोर्थ, एफ.वी. कृत दि इंडियन एक्सचेंज प्राब्लम, 1921 पृष्ठ 9.