रुपये की समस्या : इसका उद्भव और समाधान - Page 22

प्रथम संस्करण की भूमिका

आगामी पृष्ठों में मैने उन घटनाओं का विवरण प्रस्तुत करने का प्रयास किया है, जिनका संबंध विनिमय मानक स्थापित करने और उसके सैद्धांतिक आधार की जांच करने की दिशा से संबंधित है।

इस विषय में ऐतिहासिक पक्ष के विवेचन के प्रयास में मैंने इस बात की सावधानी रखी है कि इस विषय में अन्य महानुभावों द्वारा कही गई बातों को न दुहराया जाए। उदाहरणार्थ विनिमय के मानक की वास्तविक कार्यप्रणाली के विवेचन के लिए मैं सामान्य विवेचन तक ही सीमित रहा हूं और उतने ही आवश्यक विवरण प्रस्तुत किए हैं जिनसे पाठक उस आलोचना का अनुसरण कर सकें जो मैंने प्रस्तुत की है। यदि अधिक विवरण की आवश्यकता हो तो ऐसे विवरण अन्य ग्रन्थों में विस्तारपूर्वक दिए गए हैं। उनकी यहां पुनरावृत्ति अनावश्यक होगा। इसके अतिरिक्त, इससे मेरे तर्क का युक्तिसंगत चित्रण भी धुंधला पड़ जाएगा। परंतु अन्य दृष्टिकोण से मैं व्यापक ऐतिहासिकता की पृष्ठभूमि प्रस्तुत करने के लिए बाध्य था जो कि अन्य लेखकों द्वारा नहीं किया गया है। भारतीय मुद्रा पर उपलब्ध ग्रंथों से कम से कम इस बात का यथेष्ट संकेत नहीं मिलता कि किन परिस्थितियों के कारण सन् 1893 के सुधारों की आवश्यकता हुई। मेरी धारणा है कि प्रारंभिक इतिहास के अध्ययन की अधिक आवश्यकता है ताकि पाठक को ऐसा परिप्रेक्ष्य मिल सके जिससे वह स्वयं उन मुद्दों का निर्णय कर सके जो मुद्रा संकट उनके दिए गए समाधान में निहित हैं। इसी दृष्टिकोण से मैंने 1800 से 1893 तक की भारतीय मुद्रा के इतिहास की सर्वाधिक उपेक्षित अवधि का अध्ययन किया है। अन्य लेखकों ने विनिमय-मानक की कहानी का आकस्मिक रूप से वर्णन ही नहीं किया है बल्कि उन्होंने इस विचार को भी लोकप्रिय बनाया है कि विनिमय-मानक भारत सरकार के चिंतन की देन है। लेकिन मुझे लगा कि यह सबसे बड़ी भूल है। वास्तव में भारतीय मुद्रा के लिए सबसे रोचक बात यह है कि किस प्रकार स्वर्ण मानक, स्वर्ण विनिमय मानक में परिवर्तित हो गया। इस त्रुटि का पर्दाफाश करने के लिए कुछ पुराने तथ्यों को, जिन्हें लोग विस्मृत कर चुके हैं, पुनः सामने लाने को बाध्य होना पड़ा।

प्रो. कीन्स की पुस्तक के अतिरिक्त सैद्धांतिक पक्ष की दृष्टि से अन्य कोई सामग्री