8 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
उपलब्ध नहीं है, जिसमें इसके वैज्ञानिक आधार का अध्ययन समाहित हो। परंतु उनके निष्कर्ष से मेरे निष्कर्ष बिल्कुल विपरीत है। विनिमय-मानक संबंधी उनकी लगभग हर मान्यता से हमारे मतभेद थे। यह मतभेद उस आधारभूत तथ्य से उद्भूत होता है जिसकी प्रो. कीन्स ने सर्वथा उपेक्षा की है कि जब तक रुपये की सामान्य क्रय शक्ति को स्थिर नहीं किया जाता तब तक कुछ भी स्थिर नहीं हो सकता। विनिमय-मानक ऐसा नहीं करता। यह मानक सिर्फ रोग-लक्षण से ही संबंधित है, रोग की तह में नही पहुंचता वास्तव में, जैसा कि मैंने स्पष्ट किया है कि यदि कुछ भी है तो यह रोग को बढ़ाता है।
जब मैं इसके समाधान की बात करता हूं तो मैं पुनः उन अधिकांश महानुभावों के साथ टकराव की स्थिति में आ जाता हूं जो मेरे समान ही विनिमय-मानक के विरोधी हैं। यह कहा जाता है कि रुपये की स्थिरता का सबसे उत्तम उपाय उसे प्रभावकारी ढंग से स्वर्ण में बदल देने से उपलब्ध होता है। मैं इस बात से इंकार नहीं करता कि रुपये को स्थिर करने का यह एक उपाय है, परंतु मेरा विचार है कि इससे भी कहीं अधिक अच्छा उपाय यह होगा कि रुपये के जारी किए जाने की निर्धारित सीमा के साथ अपरिवर्तनीय रुपया मान लिया जाए। वास्तव में यदि इस विषय में मेरा वश चलता तो मैं यह प्रस्ताव करता कि भारत सरकार को रुपये गला देने चाहिए और उन्हें बुलियन (सर्राफा) के समान बेच देना चाहिए तथा उपलब्ध राशि का राजस्व के प्रयोजनों के रूप से उपयोग करना चाहिए और अपरिवर्तनीय कागजी मुद्रा द्वारा रिक्त स्थान की पूर्ति करनी चाहिए। परंतु यह एक क्रांतिकारी प्रस्ताव होगा और इसलिए मैं इसको लागू करने का आग्रह नहीं करूंगा, यद्यपि मैं इसे मुख्य रूप से ठोस प्रस्ताव मानता हूं। खैर मुख्य बात टकसालों को बंद करने की है न केवल जनता के लिए जैसे कि वे हैं अपितु सरकार के लिए भी। यदि एक बार ऐसा हो जाता है तो मैं यह साहसपूर्वक कहता हूं कि इस मामले में निर्धारित रुपये की मुद्रा के साथ विधिमान्य चलार्थ के रूप में सोने पर आधारित भारतीय मुद्रा उन सिद्धांतों के समरूप है जो कि अंग्रेजी मुद्रा पद्धति में समाहित हैं।
यह ध्यान देने योग्य बात होगी कि मैं फाउलर समिति की सिफारिशों की ओर जाने का प्रस्ताव नहीं करता। वे सभी व्यक्ति जो स्वर्ण मानक से स्वर्ण विनिमय-मानक तक भारतीय मुद्रा के परिवर्तन के प्रति खेद प्रकट करते हैं, यह प्रतिपादित करते हैं कि सभी कुछ बिल्कुल ठीक हो जाता यदि सरकार ने उस समिति की सिफारिशों का पूर्णतया पालन किया होता। मैं इस विचार से सहमत नहीं हूं। दूसरी ओर मुझे ऐसा लगता है कि भारतीय मुद्रा उस परिवर्तन में समाहित हुई क्योंकि सरकार ने उन सिफारिशों का पालन किया। कुछ लोग उस रिपोर्ट को उसकी बुद्धिमता की दृष्टि से उत्कृष्ट (क्लासिक) समझते हैं जबकि उस रिपोर्ट को मैंने देखा कि यही वह समिति