6. विनिमय मानक की स्थिरता - Page 221

206 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

इसकी समता में कोई मजबूती नहीं आई। सात वर्ष के अंतराल के बाद 1907 में रुपया अपने सममूल्य से फिर नीचे गया। 1914 में रुपये में एक बार और गिरावट आई। 1917 से इसमें बहुत तेजी से उछाला आया और 1920 के बाद इसमें पुनः गिरावट आई। इस विलक्षण स्थिति से स्वभावतः यह प्रश्न पैदा होता है कि इन अवसरों पर रुपया स्वर्ण से अपनी समता क्यों नहीं बनाए रख सका? इस प्रश्न के सही उत्तर से पता चलेगा कि विनिमय प्रतिमान की कमजोरी किस बात से निहित है।

रुपयों में गिरावट का एकमात्र वैज्ञानिक कारण यह हो सकता है कि रुपया अपनी सामान्य क्रयशक्ति खो बैठा है। यह एक सुस्थापित तथ्य है कि किसी मुद्रा या लेखा की इकाई का मूल्य किसी अन्य मुद्रा में या किसी अन्य लेखा की इकाई में इतना होगा जितना सामान उससे खरीदा जा सकता है। एक ठोस उदाहरण लेंµ अंग्रेज लोग और अन्य लोग भारत के रुपये का उतना मूल्य लगाएंगे जितना वे रुपयों से भारतीय माल खरीद सकेंगे। दूसरी ओर भारतीय लोग अंग्रेजी पौंड का (या लेखा की अन्य किसी इकाई का) उतना मूल्य लगाएंगे जितना वे इन पौंडों से अंग्रेजी सामान खरीद सकेंगे। यदि भारत में रुपये की क्रय शक्ति बढ़ जाती (अर्थात् भारत में मूल्य स्तर गिर जाता है) जबकि पौंडों की क्रय शक्ति घट जाती है या स्थिर रहती है या कम तेजी से बढ़ती है (अर्थात् अंग्रेजी मूल्य स्तर भारतीय मूल्य स्तर की अपेक्षा अधिक बढ़ता है), तो पहले से कम रुपये पौंड के बराबर हो जाएंगे अर्थात् पौंड के रूप में भारतीय रुपयों का विनिमय मूल्य बढ़ जाएगा। दूसरी ओर यदि भारत में रुपये की क्रय शक्ति घट जाती है (अर्थात् भारतीय मूल्य स्तर बढ़ जाता है) जबकि पौंड की क्रय शक्ति बढ़ जाती है या स्थिर रहती है या कम तेजी से गिरती है (अर्थात् यदि अंग्रेजी मूल्य स्तर भारतीय मूल्य स्तर की अपेक्षा गिरता है) तो अधिक रुपये एक पौंड के बराबर होंगे अर्थात् पौंड के मुकाबले रुपये विनिमय मूल्य घट जाएगा।

इस सिद्धांत के आधार पर भारतीय विनिमय स्तर में गिरावट से भारतीय मूल्य स्तर की गतिविधि में ढूंढ़ना होगा। इस प्रस्ताव की वैधता के बारे में कोई संदेह न हो, इसके लिए हमें गिरावट की हर घटना को देखना चाहिए और यह देखना चाहिए कि क्या यह गिरावट रुपयों की क्रय शक्ति में गिरावट से मेल खाती है। ख्1,

  1. इन तालिकाओं में दिए गए आंकड़े, तब तक अन्यत्र उल्लेख न हो रिपोर्ट ऑफ दि प्राइस इनक्वायरी

कमेटी, कलकत्ता 1914 से लिए गए हैं।