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विनिमय मानक की स्थिरता

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इस तथ्य को देखते हुए कि रुपये का स्वर्ण मूल्य 2 शिलिंग स्वर्ण तक बढ़ाने का कोई मतलब नहीं क्योंकि उसकी क्रय शक्ति तो 1 शिलिंग 4 पैंस भी नहीं थी। कमेटी ने गैर-जिम्मेदाराना शब्दों में भारतीय विनिमय को स्थिरता प्रदान करने की इच्छा प्रकट की। परंतु इस दृष्टि से कमेटी का इस बात पर जोर देना कि रुपयों को स्वर्ण से जोड़ दिया जाए, कुछ उपहासपूर्ण ही कहा जाएगा। प्रो. मार्शल के शब्दों में स्थिर विनिमय की बात करना ऐसा ही है कि दुनिया भर की रेलों के विभिन्न गेजों को मुख्य लाइन के गेज में बदल दिया जाए। यदि स्थिर विनिमय से यही आशा की जाती है तो रुपये का स्वर्ण से जोड़ने का मतलब ही क्या है जब स्वर्ण ‘मेन लाइन’ रहा ही नहीं? लोग तो एक ऐसे प्रतिमान का स्थिर विनिमय चाहते हैं जिनमें मूल्य मापे जाते हों। स्वर्ण से जोड़ने का मतलब है कि उसे स्टर्लिंग से अलग कर दिया जाए जब असली महत्व स्टर्लिंग का है न कि स्वर्ण का। स्वर्ण के मुकाबले स्टर्लिंग के महत्व को देखते हुए क्या किसी स्थिर विनिमय नीति की जरूरत भी है?

अब स्थिरता की समस्या मुख्यतः इस बात की है कि दो मुद्राओं की क्रय शक्ति समता में असामान्य फेरबदल न हो जाए। भारत के मामले में रुपये और स्टर्लिंग की क्रय शक्ति समता में कोई असामान्य फेरबदल नहीं हुआ अपितु दूसरी ओर भारतीय विनिमय कमोबेश उसके अनुरूप चलता रहा। इसलिए विनिमय स्थिरता की नीति को शुरू करने का कोई भी कारण नहीं था। परंतु मान लीजिए कि उसमें कुछ कारणों से असामान्य फेरबदल हुए और जिनका कमेटी को पता था कि कमेटी को यह विश्वास था कि रुपया अपने पुराने विनिमय मूल्य की प्राप्ति नहीं कर पाएगा जो उसकी क्रय शक्ति को देखते हुए उचित था कि कमेटी को विनिमय की एक ऐसी दर निर्धारित कर देनी चाहिए थी जो रुपये की क्रय शक्ति की सीमाओं के भीतर होती। अब जो हुआ, कमेटी ने रुपये का ऐसा मूल्य स्थिर किया जो कभी भी रुपये का मूल्य नहीं रहा था। रुपये का मूल्य उसी क्रय शक्ति समता से अधिक निर्धारित करके कमेटी ने रुपये का मूल्य स्थिर करने की सरल सी समस्या की जगह एक कहीं बड़ी और बिल्कुल भिन्न समस्या पैदा कर दी जो रुपये के मूल्य की अवस्फीति करने की या उसका पूर्ण या मूल्य बढ़ा देने की। यह लक्ष्य किस तरह प्राप्त किया जा सकता है? कमेटी ने इस समस्या पर विचार किया ही नहीं। और क्यों? क्या इसलिए कि चांदी का मूल्य बढ़ गया था? शायद ऐसा हो। परंतु यह बात संदेहास्पद है कि क्या कमेटी को यह दृढ़ विश्वास था कि चांदी का मूल्य स्थायी रूप से इतना बढ़ जाएगा कि स्वर्ण के मुकाबले उसकी दर में संशोधन किया जाए। किसी भी व्यक्ति ने जिसने चांदी की कीमत में वृद्धि का अध्ययन किया है उन्हें पता चल गया होगा कि वह वृद्धि मुख्यतः सट्टेबाजी के आधार पर थी, स्थायी नहीं थी।