विनिमय मानक की स्थिरता 223
जो स्वर्ण इसके पास पड़ा है, उसे भारत के सोने की संज्ञा दी जाय। परन्तु फिर भारत में मुद्रा की अतिरिक्त मांग कैसे पूरी की जाती? विचार-विमर्श के बाद इस बात पर सहमति हुई कि भारत में बिना स्वर्ण के मुद्रा जारी करने का सर्वोत्तम तरीका सैक्रेटरी ऑफ स्टेट के लिए यह होगा कि उसे भारत की ओर से जो स्वर्ण मिले, वह उसका निवेश भारत की ओर से ब्रिटिश ट्रेजरी बिलों की खरीद में कर दे और भारत सरकार इन बिलों की जमानत के आधार पर मुद्रा के नोट जारी कर दे। अब यहां यह देखा जा सकता है कि इस तरह भारत में कागजी मुद्रा जारी करने के बुनियादी सिद्धांत में जोरदार संशोधन कर दिए गए। सिद्धांत यह था कि निक्षेपी (फिडुशियरी) नोटों की मात्रा बढ़ा दी जाए और ऐसा करने के लिए सुरक्षित धातु के एक भाग का निवेश तभी किया जाए जब काफी लम्बी अवधि के बाद यह देखा जाए कि प्रचलन में कुल नोटों के मुकाबले सुरक्षित धातु के अनुपात से यह पता चले कि सुरक्षित निवेश का विस्तार करने की ओर धातु के सुरक्षित भंडार में कमी करने की आवश्यकता है। इस सिद्धांत का सबसे बड़ा प्रभाव यह था कि कागजी मुद्रा की मात्रा लोगों की आदतों पर निर्भर करती है क्योंकि किसी भी समय निक्षेपी नोटों की मात्रा उस सुरक्षित धातु भंडार के अनुरूप होती थी जो एक समय विद्यमान होते थे। नई योजना में पुराने सिद्धान्त को त्याग दिया गया था और कागजी मुद्रा बिना किसी सुरक्षित धातु भंडार के जारी कर दी जाती है और उससे भी महत्त्वपूर्ण बात यह है कि कागजी मुद्रा की मात्रा लोगों की आदतों पर नहीं बल्कि सकार की आवश्यकता पर और सरकार के पास विद्यमान सिक्युरिटी पर निर्भर करती थी। भारत सरकार ने यह आत्मघाती और सहज प्रक्रिया इतनी अधिक अपनाई कि चार वर्षों में ही इसे एक के बाद एक आठ अधिनियम पास करने पड़े और सिक्यूरिटीज के बदले वह नोट जारी करती गई। तालिका- XLIII से पता चलता है कि अधिनियम में कितनी सीमा निर्धारित की गई और उनके अंतर्गत असल में कितनी मुद्रा जारी की गई।
परन्तु इस सरल प्रक्रिया को हमेशा के लिए तो जारी नहीं रखा जा सकता था क्योंकि उसका नोटों में परिवर्तनीयता पर बुरा असर पड़ता। फलतः कागजी मुद्रा की मात्रा बढ़ाने से मुद्रा की मांग बढ़ी जिसने सरकार को इस बात के लिए विवश किया कि वह धातु की मुद्रा की व्यवस्था करे ताकि खरीद के चालू साधनों का इंतजाम किया जा सके और ढीली पड़ रही कागजी मुद्रा को भी सहारा दिया जा सके। चूंकि चांदी की कीमतें बढ़ रही थीं, इसलिए सरकार ने स्वाभाविक तौर पर सोने को अपनाया। 29 जून, 1917 को एक अध्यादेश जारी किया गया जिसके अंतर्गत यह जरूरी हो गया कि भारत में आयात किया जाने वाला सारा सोना सरकार को स्टर्लिंग एक्सचेंज पर आधारित मूल्य पर बेचना होगा और मोहरें बनाने के लिए बम्बई में एक टकसाल खोली गई। ख्1, विभिन्न स्थानों से स्वर्ण प्राप्ति के अनथक प्रयास किए गए 9 जून, 1917 को संयुक्त राज्य अमरीका के स्वर्ण के निर्यात पर रोक हटाने और दक्षिण अफ्रीका तथा आस्ट्रेलिया के
- 1918 का अधिनियम 14