222 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
वृद्धि नहीं हुई और 1911 में भी जारी किए गए नए सिक्कों की संख्या बहुत कम थी। 1909 और 1912 में 24 से 40 लाख रुपये के सिक्के जारी किए गए। परंतु इस अवधि के अंतिम दो वर्षों में अचानक ही बहुत बड़ी मात्रा में रुपये के सिक्के जारी कर दिए गए और सिक्कों की कुल मात्रा 26 ½ करोड़ रुपये तक पहुंच गई। इस अवधि में कागजी मुद्रा का भी तेजी से विस्तार हुआ। 1909 में 5 रुपये का नोट बर्मा में भी सर्वत्र स्वीकृत मुद्रा मान लिया गया। इससे पहले इसे भारत के सभी भागों में स्वीकृत मुद्रा मान लिया गया था। इस अवधि में नोटों को सर्वत्र स्वीकृत करने की प्रक्रिया जारी रही और पेपर करेंसी अधिनियम (1910 का II ) के अंतर्गत दिए अधिकार से 1910 में 5 रुपये और 50 रुपये तथा 1911 में 100 रुपये के नोट सर्वत्र स्वीकृत मान लिए गए। इसी के साथ अधिक मात्रा में कागजी मुद्रा को प्रोत्साहन दिया गया और 1911 के अधिनियम VII के अंतर्गत भारत सरकार ने वास्तव में कागजी मुद्रा के निक्षेपी या फिडुशियरी भाग को 12 करोड़ से बढ़ाकर 14 करोड़ रुपये कर दिया। इसी तरह प्रचलन में 2 करोड़ रुपये और आ गए।
चौथी अवधि (1915-20) में जितनी भी सावधानियां बरती जाती थीं उन्हें तिलांजलि दे दी गई। ख्1, इसी अवधि में दूसरा महायुद्ध शुरू हुआ जिसके कारण भारतीय माल की मांग बहुत बढ़ गई और भारत को ब्रिटिश साम्राज्य की ओर से भी भारी व्यय करना पड़ा। इन दोनों के लिए सरकार को खरीद के अपने चालू साधनों में वृद्धि करनी पड़ी। इस आवश्यकता की पूर्ति करने के लिए सरकार के पास तीन साधन थे-(1) सोने का आयात किया जाए, (2) रुपये के सिक्कों की मात्रा बढ़ाई जाए, और (3) कागजी मुद्रा में वृद्धि की जाए। इससे यह बिल्कुल नहीं समझना चाहिए कि भारत सरकार के पास आवश्यक मुद्रा मुहैया करने के साधन नहीं थे। भारत सरकार भारत में जो भी खर्च करती थी, लंदन में सैक्रेटरी ऑफ स्टेट को उसकी अदायगी कर दी जाती थी। इस तरह साधन प्रचुर मात्रा में थे। कठिनाई केवल यह थी कि उन्हें उचित खाते में कैसे बदला जाए। सामान्यतया सैक्रेटरी ऑफ स्टेट अपने पास उपलब्ध स्वर्ण से चांदी खरीद लेता है ताकि भारत में उससे रुपये के सिक्के बनाए जाएं। इस अवधि के पहले दो वर्षों में यही आम तरीका अपनाया गया था और इसी तरीके से मुद्रा की मात्रा बढ़ा दी जाती थी। परंतु चांदी के मूल्य बढ़ने से इस साधन की उपलब्धि कम हो गई। इस तरह सैक्रेटरी ऑफ स्टेट को दो बातों में से चुनाव करना थाµया तो स्वर्ण बाहर भेजे या कागजी मुद्रा जारी करे। इसमें से पहले विकल्प को देशभक्ति पूर्ण नहीं माना गया था। वास्तव में तो सैक्रेटरी ऑफ स्टेट को विश्वास था कि साम्राज्यिक दृष्टिकोण से यह बात भी बिल्कुल अभद्रतापूर्ण होगी कि इंग्लैंड में
- इस अवधि की मुद्रा नीति के मुख्य स्रोत हैं उन वर्षों के भारत सरकार के वार्षिक वित्तीय विवरण।