विनिमय मानक की स्थिरता 227
हो सकते हैं कि हमें रुपये के मूल्य में संभावित गिरावट आने की चिन्ता नहीं करनी चाहिए। भारत सरकार के पास ऐसा कोष हैं और सभी तीनों अवसरों पर जब रुपये का स्वर्ण सममूल्य से अधिक गिरा तो इस कोष का सहारा लिया गया। प्रतिदान की यह क्रिया मुख्यतः तीन तरीकों से की जाती हैµ(1) रिवर्स कौंसिल्स की बिक्री से जिसके द्वारा सरकार लन्दन में सोना लौटा कर रुपये प्राप्त कर सकती है_ (2) भारत में रुपये प्राप्त करने के लिए आंतरिक रूप से सोना मुक्त कर सकती है_ (3) सैक्रेटरी ऑफ स्टेट के कौंसिल बिलों को रोक कर अधिक रुपयों को प्रचलन में आने से रोक सकती है। कहा जाता है कि इन सबका कुल प्रभाव यह पड़ेगा कि इससे मुद्रा में संकुचन आएगा और उसका मूल्य सममूल्य पर पहुंच जाएगा। यद्यपि इन तीनों उपायों का उपयोग किया जा सकता है, तथापि सरकार प्रतिदान की प्रक्रिया का उपयोग ही सबसे अधिक करती है। इन तीनों अवसरों पर प्रतिदान का कितना उपयोग किया गया था, यह तालिकाएं XLV, XLVI, XLVII तथा XLVIII से स्पष्ट है जो अगले पृष्ठों पर दी गई हैं।
पिछले दो अवसरों पर इस प्रक्रिया की सफलता से इस विश्वास को बल मिला है कि इससे रुपये का मूल्य पुनः स्थापित किया जा सकता है। परन्तु 1920 के संकट के समय इस प्रक्रिया की असफलता से इस प्रक्रिया के सामान्य रूप से कारगर होने पर संदेह पैदा हो गया। यह नहीं कहा जा सकता कि विनिमय दर इसलिए सफल नहीं हुई क्योंकि यह प्रक्रिया अमल में नहीं लाई गई थी। तथापि दूसरी ओर 1920 में रिवर्स कौंसिल्स की बिक्री के बारे में सरकार के विचारों में 1907-08 के संकट के दौरान के मुकाबले बहुत परिवर्तन आ गया था। उस संकट के समय सरकार ने एक कृपण की तरह व्यवहार किया था_ वह अपने स्वर्ण भंडार पर जम कर बैठी हुई थी और जिस उद्देश्य के लिए स्वर्ण भंडार की स्थापना की गई थी, उसके लिए सरकार ने उसका उपयोग करने से मना कर दिया। एक एकाउंटेंट जनरल को ‘‘घुटनों के बल चलाकर’’ भारत सरकार को इस बात के लिए राजी रखना पड़ा था कि वह सोने को मुक्त कर दे। ख्1, 1907 में स्वर्ण भंडार का उपयोग न कर सकने पर चैम्बरलेन कमीशन ने इसको तो डांट पिलाई थी, शायद उसे ध्यान में रखते हुए 1920 के संकट के समय सरकार ने रिवर्स कौंसिल्स बेचने की नीति पर इतने साहसपूर्वक परिकल्पना की, आम जनता ने अज्ञानतावश इस नीति की बहुत अधिक आलोचना की कि यह तो ‘संगठित लूट’ है? परन्तु वित्त मंत्री अविचलित रहे और उन्होंने तर्क दिया कि ख्2, ःµ
चैम्बरलेन कमीशन के सामने मि. एफ.सी. हैरिसन का साक्ष्य, पृ. 10, 209
रिवर्स कौंसिल्स प्रस्ताव पर भाषण, 10 मार्च, 1920, एस.एल.सी.पी. खण्ड 518 पृष्ठ 1291