226 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
तालिका XLIV
रुपये के सिक्कों की ढलाई, 1915µ20
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|---|---|---|---|
| 1915&16 1916&17 1917&18 1918&19 1919&20 |
8]636]000 124]535]000 70]923]000 106]410]000 14]108]000 |
& & & 152]518]000 60]875]000 |
& & & & & |
अब जब हम यह देखते हैं कि 1900 से 1914 तक सरकार ने 53 करोड़ 20 लाख स्टैंडर्ड औंस चांदी के सिक्के बनाए थे ख्1, तो इसका तात्पर्य यह हुआ कि इन पांच वर्षों में चांदी के सिक्कों की मात्रा पिछले 14 वर्षों की अपेक्षा 50 लाख औंस अधिक थी।
इस तरह अपरिवर्तनीय मुद्रा असीमित मात्रा में जारी करने की शक्ति का उपयोग करने का एक अपरिहार्य परिणाम था कि रुपये के स्वर्ण मूल्य में गिरावट आई। इतिहास में ज्ञात सभी अपरिवर्तनीय मुद्राओं का ही ”ास हुआ है। परन्तु यह कहा जाता है कि रुपये की मुद्रा को इसका एक अपवाद मानना चाहिए क्योंकि यदि सरकार को इसे असीमित मात्रा में जारी करने की छूट है तो गिरावट होने की दशा में सरकार के पास इन दुष्प्रभावों को सुधारने के उपाय भी हैं। इसलिए अब हमें इन उपायों की जांच करनी चाहिए।
इस तर्क का आधार यह है कि रुपया एक प्रतीक या टोकन मुद्रा है और यदि प्रत्येक मुद्रा का मूल्य स्वर्ण में प्रतिदान के सिद्धांत लागू करके स्वर्ण के सममूल्य पर बनाए रखा जा सकता है ख्2, तो वही प्रक्रिया अपना कर रुपये को स्वर्ण के समतुल्य रखा जाना भी संभव होना चाहिए। जरूरत इस बात की है कि स्वर्ण का पर्याप्त कोष हो और जब तक सरकार के पास यह कोष है, तब तक हम इस बारे में आश्वस्त
- तुलना करें ये आंकड़े एल. अब्राह्म ने 1919 की करेंसी कमेटी के समक्ष अपने साक्ष्य में दिए थेµसाक्ष्य
के कार्यवृत्त, प्रश्न 37-41
- इस संबंध में लाफलिन कृत ‘प्रिंसिपल ऑफ मनी’ अध्याय XV में प्रतीक मुद्रा के बारे में एक रोचक विवाद
पढ़ा जा सकता है। लगे हाथों यह बताया जा सकता है कि लाफलित मुद्रा के द्रव्य परिणाम सिद्धांत का
विरोधी है परन्तु प्रतीक मुद्रा के बारे में इस विवाद में वह असल में इस सिद्धांत को मान लेता है।