232 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
‘‘यह हमारी विनिमय नीति का एक अभिन्न अंग हैµ कि हम न केवल लगभग गोल्ड पाइंट पर कौंसिल बिल्स के जरिए लन्दन से भारत को प्रेषण करें बल्कि विनिमय की निर्बलता के समय भी गोल्ड पाइंट पर ही भारत से लन्दन को भी स्टर्लिंग प्रेषण की, या जिसे रिवर्स कौंसिल्स कहते हैं उसकी बिक्री की व्यवस्था होनी चाहिए। सीधी-सादी भाषा में यह स्वर्ण के निर्यात का विकल्प है। यह कोई नई बात नहीं है। हम वर्षों से रिवर्स कौंसिल्स बेच रहे हैं.... और जब तक हम ऐसा नहीं करेंगे, विनिमय नीति प्रभावकारी नहीं होगी।.... यही कारण है और एकमात्र कारण है कि हमने रिवर्स कौंसिल्स बेचे हैं.... वास्तव में यह विनिमय दर को गोल्ड पाइंट के निकटतम रखने का प्रयास है.... यदि हम दबाव के आगे झुक गए और कौंसिल बिल बेचने बिल्कुल बन्द कर दिए तो उसका क्या परिणाम होगा? मैं यह मांग तो समझ सकता हूं कि रिवर्स कौंसिल्स किसी अन्य तरीके से बेचे जाएं या वर्तमान में लागू दरों से भिन्न दरों पर बेचे जाएं परन्तु मुझे यह मांग समझ में नहीं आती कि रुपयों को बाहरी मुद्रा में बदलने की सुविधाएं बिल्कुल वापस ले ली जाएं। बम्बई में कहा जाता है कि विनिमय को अपने ‘स्वाभाविक स्तर’ पर आने दिया जाए। इस सूत्र शब्द का मुझ पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। हाल में जिस विचार को लेकर इस शब्द का उपयोग किया गया है, विनिमय में ‘स्वाभाविक स्तर’ जैसी कोई चीज नहीं होती क्योंकि जब हम आंतरिक मुद्रा को किसी और मुद्रा में बदलते हैं, तो कोई ऐसा सामान्य मापदण्ड होना चाहिए जिसके लिए दोनों मुद्राएं लाई जा सकें, यह सोना भी हो सकता है, या चांदी भी, स्टर्लिंग भी, स्पेन का पेसेटा भी, जिसे आधार बनाया जा सकता है। रुपये को भी किसी चीज से जोड़ना चाहिए ख्1,, और जब उसे किसी चीज से जोड़ा जाए तो उसकी एक निश्चित दर होनी चाहिए, और इसके लिए यह जरूरी है कि कभी-कभी हमें रिवर्स कौंसिल्स बेचने के लिए भी तैयार रहना चाहिए ताकि हम इस दर को बनाए रख सकें। यदि रिवर्स कौंसिल्स को पूरी तरह वापस ले लिया जाए तो हमारा न तो स्वर्ण प्रतिमान (स्टैंडर्ड) होगा, न स्वर्ण विनिमय प्रतिमान होगा और न ही किसी और किस्म का प्रतिमान।’’
- 21 जून, 1920 के अध्यादेश III के द्वारा भारतीय सिक्का ढलाई अधिनियम (1906 का III ) की धारा
11 में वर्णित स्वर्ण सिक्के भुगतान के लिए खाते के लिए या वैध मुद्रा नहीं रहे पर यह व्यवस्था की
गई कि 21 दिन की अवधि में 15 रुपये की दर से सरकार उन्हें स्वीकार कर लेगी। यहां अध्यादेश 9
सितम्बर, 1920 तक लागू रहा जब 1920 के अधिनियम XXXVI द्वारा पौंड (सावरेन) को पुनः वैध
मुद्रा बना दिया गया। इस अवधि में भारत में सोने को कोई वैध दर्जा प्राप्त नहीं था।