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विनिमय मानक की स्थिरता 233

परन्तु उससे यह प्रश्न पैदा होता है µ यदि रिवर्स कौंसिल्स से विनिमय को ठीक किया जा सकता है, तो फिर इसका इतना विनाशकारी असफल क्यों रहा? वित्त मंत्री ने इसका उत्तर बड़े रूखे और अकाट्य शब्दों में दिया। उन्होंने कहाःµ

‘‘यदि हम रुपये के बाजार भाव और उसकी सैद्धांतिक स्वर्ण-कीमत का अंतर

कम करने में असफल रहे हैं.... तो उसका कारण यह नहीं कि हमने बहुत

ज्यादा रिवर्स कौंसिल बेचे हैं_ किन्तु यह है कि हमने बहुत कम बेचे हैं। मैं यहां

उपस्थित व्यापारी समुदाय के किसी भी सदस्य से पूछता हूं, और बिना किसी

खंडन के भय के पूछता हूं कि यदि हमारे साधनों ने अनुमति दी होती.... और

यदि हम दो, तीन या चार करोड़ के रिवर्स कौंसिल बेच सकते_ तो रुपये के

बाजार भाव और उसकी सैद्धांतिक स्वर्ण कीमत में शायद कोई भी अंतर न

रहता। हमारी कठिनाइयों में से एक यह नहीं रही कि हमने बहुत अधिक रिवर्स

कौंसिल बेचे हैं, अपितु यह रही है कि हम बहुत कम रिवर्स कौंसिल बेचने के

लिए मजबूर थे।’’ ख्1,

इस तर्क में कुछ वजन जरूर होता बशर्तें कि बेचे हुए रिवर्स बिलों की राशि ‘‘बहुत कम’’ होती। केवल दो, तीन या चार करोड़ के रिवर्स बिल नहीं बेचे गए थे बल्कि 5.50 करोड़ के रिवर्स बिल बेचे गए थे। इसके अतिरिक्त देश में भी बड़ी मात्रा में स्वर्ण जारी किया गया और कौंसिल बिलों को पूरी तरह रोक दिया गया। फिर भी रुपये का मूल्य 1 शिलिंग 4 पैंस स्टर्लिंग से अधिक नहीं बढ़ा, 2 शिलिंग स्वर्ण तक पहुंचने की बात तो दूर रही। रिवर्स कौंसिल्स की बिक्री इतनी क्यों नहीं की गई कि विनिमय ठीक हो जाता? इसलिए इसके प्रतिदान की कारगरता के समूचे प्रश्न पर विचार करना चाहिए।

यह जरूरी है कि शुरू में ही यह समझ लिया जाए कि प्रतिदान से यह भी हो सकता है कि एक मुद्रा की जगह दूसरी मुद्रा ले ले और या एक मुद्रा प्रचलन से ही हट जाए। जहां तक एक मुद्रा की जगह दूसरी मुद्रा ले लेती है, उसका कोई प्रभाव नहीं पड़ता क्योंकि इस प्रतिस्थापन से मुद्रा का संकुचन नहीं होता। ख्2, किसी मुद्रा का मूल्य पुनःस्थापित करने के लिए यह जरूरी होता है कि उसका संकुचन किया जाए

  1. उल्लिखित पृष्ठ 130।

  2. इसका सबसे उल्लेखनीय उदाहरण है अमरीकी बैंक नोट (ग्रीनबैक्स)। 1875 के कानून के अंतर्गत

1879 तक उनका प्रचलन काफी कम कर दिया गया था ताकि सोने से उनकी समानता बनाए रखी

जा सके। परन्तु 1879 में इसका प्रतिरोधी कानून बराबर ऐसे 347,000,000 नोट प्रचलन में रखे गए।

जैसे ही उसे निष्क्रिय किया जाएगा, वैसे ही उन्हें दोबारा जारी करना ही पड़ेगा। उन्हें बन्द नहीं किया

जा सकता था।