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विनिमय मानक की स्थिरता

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पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। चैम्बरलेन कमीशन ने सिफारिश की थी कि रुपयों का मूल्य बनाए रखने के लिए भारत सरकार को एक रिजर्व संचित करना चाहिए क्योंकि यूरोपियन बैंक भी अपनी मुद्राओं का मूल्य अपने-अपने रिजर्व की मार्फत बनाए रखते हैं। सत्य का इससे बड़ा विस्तृत रूप और नहीं हो सकता। यूरोपियन बैंकों ने जो किया वह चैम्बरलेन कमीशन की सिफारिशों का बिल्कुल उल्टा था। जब कभी उनका सोना लुप्त होने लगता था, वे अपनी मुद्राएं घटा देते, न केवल तुलनात्मक रूप में अपितु पूर्ण रूप में भी । वे तो अपनी मुद्राओं की सीमाएं बांध-करके अपनी मुद्राओं का मूल्य भी और स्वर्ण रिजर्व भी बनाए रखते थे।

इस तरह रिजर्व होने से स्वर्ण विनिमय मानक की शक्ति नहीं बढ़ सकती। दूसरी तरफ, यदि हम रिजर्व की उत्पत्ति के बारे में जांच-पड़ताल करें तो पता चलेगा कि यह उस मानक के लिए भारी कमजोरी का कारण बनता है। सरकार अपना स्वर्ण मानक स्टैंडर्ड रिजर्व कैसे प्राप्त करती है? क्या वह अपना रिजर्व इसी तरह बढ़ाती है जैसे बैंक अपने द्वारा जारी मुद्रा आदि का परिचालन घटा कर? इसका बिल्कुल उल्टा होता है। भारतीय स्वर्ण मानक रिजर्व की संरचना इतनी विचित्र है कि इसकी परिसंपत्तियों अर्थात् रिजर्व और इसकी देयताएं अर्थात् रुपया पूरी तरह सहगामी है। दूसरे शब्दों में रिजर्व तब तक नहीं बढ़ सकते जब तक कि रुपये की मुद्रा न बढ़े। यह अनिष्टकारी स्थिति इसलिए पैदा होती है कि रिजर्व को रुपये के सिक्के की ढलाई से होने वाले लाभ से बनाया जाता है। जब यही मूल स्रोत है तो यह स्पष्ट हो जाता है कि यह कोष केवल तभी बढ़ सकता है जब रुपये के सिक्के अधिक ढाले जाएं। एक रुपये के सिक्के ढालने से जो लाभ होता है, वह इस बात पर निर्भर करता है कि रुपये पर लागत कितनी आती है और इसका विनिमय मूल्य कितना है। ढलाई के खर्च के अतिरिक्त, जो कमोबेश निश्चित होता है, इस स्थिति में सबसे महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता चांदी की कीमत पर पड़ता है। रिजर्व में डालने के लिए कोई लाभ होगा या नहीं, वह इस बात पर निर्भर करेगा कि रुपये ढालने वाली चांदी की क्या कीमत दी गई थी। ख्1,

जैसा कि इसकी मूल उत्पत्ति से पता चलता है, यह रिजर्व न केवल एक बुराई है, अपितु इसकी दस्तावेजी प्रकृति को देखते हुए, इस रिजर्व पर संकट के समय पूरी तरह निर्भर भी नहीं रहा जा सकता। इसमें कोई संदेह नहीं कि रिजर्व के निवेश के पीछे सरकार का आशय यही है कि जिन सिक्यूरिटिज में इसका निवेश किया जाता है, उसका ब्याज जमा होने से रिजर्व और भी बढ़ जाएंगे। सरकार के आलोचक चाहते हैं कि रिजर्व बड़ा भी हो और उसी के साथ धातु में हो। परंतु वे यह नहीं समझते कि

  1. श्री एम.एल. रेड्डी गारू के उत्तर में (पृष्ठ 232 पर अंकित) वक्तव्य पटल पर रखा गया था।