अध्याय - 7
स्वर्ण मानक की ओर वापसी
विनिमय मानक की ओर से जो दावा किया जाता है कि वह रुपये की स्वर्ण से समानता बनाए रखता है, उस दावे के आधार पर हमने इसको परखा है। इस मान के गुणावगुणों का पता लगाने के लिए चैम्बरलेन कमीशन ने यह कसौटी निर्धारित की थी। परन्तु क्या इस कसौटी की समता विवाद के परे है? दूसरे शब्दों में मान लीजिए कि रुपये ने स्वर्ण से अपनी समानता बनाए रखी है, जो वास्तव में उसने जितनी बार बनाए रखी है, उतनी ही बार नहीं भी बनाई, तब क्या इसका यह मतलब निकलता है कि एक अच्छी मुद्रा प्रणाली के सभी लक्ष्यों की पूर्ति हो गई है?
विनिमय मान में, ‘‘जैसी कि आज यह प्रणाली चलाई जा रही है, स्वर्ण से इसकी समानता रखने के लिए, सिक्कों की ढलाई में जोड़-तोड़ की जाती है। ख्1, मानो मुद्रा का महत्त्व यही है कि वह कितना स्वर्ण प्राप्त कर सकती है। परन्तु जो लोग धन का उपयोग करते हैं, उनके लिए महत्त्वपूर्ण बात यह नहीं होती कि उसका स्वर्ण में कितना मूल्य है अपितु यह होती है कि उस मुद्रा का वस्तुओं में कितना मूल्य है और इन वस्तुओं में स्वर्ण बिल्कुल नगण्य जैसा होता है। इसलिए हर जगह प्रयास यह किया जाता है कि सामान्य तौर पर वस्तुओं के रूप में मुद्रा का मूल्य स्थिर रहे, और ऐसा करना उचित भी है क्योंकि लोगों के कल्याण के लिए स्वर्ण उतना महत्त्वपूर्ण नहीं है जितना कि अनेकाकृत प्रत्यक्ष उपयोग वाली वस्तुएं और सेवाएं होती हैं। स्वर्ण के रूप में मुद्रा की स्थिरता का महत्त्व केवल स्वर्ण के व्यापारियों के लिए होता है परन्तु वस्तुओं के रूप में मुद्रा की स्थिरता का प्रभाव सब पर पड़ता है जिसमें सोने के व्यापारी भी शामिल हैं। यहां तक कि प्रो. केन्स ने भी 1919 की इंडियन करेंसी कमेटी के सामने अपने साक्ष्य में कहा था ख्2, ःµ
‘‘मेरा हमेशा यह लक्ष्य होना चाहिए............. भारतीय कीमतें हमेशा वस्तुओं के संदर्भ में स्थिर रहनी चाहिए बजाय इसके कि किसी धातु या विदेशी मुद्रा के संदर्भ में स्थिर रहें। मुझे यह भारत के लिए कहीं अधिक महत्व का लगता है।’’
फिशर पर्चेंजिंग पावर ऑफ मनी, 1911, पृ. 340
प्रश्न 2,690