7. स्वर्ण मानक की ओर वापसी - Page 271

256 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

हां, यहां यह समझना कुछ कठिन सा लगता है कि उच्च विनिमय दर अपनाने से, जिसका वे समर्थन करते हैं, यह लक्ष्य किस तरह प्राप्त होगा। विनिमय को ऊंचा करना एक व्यर्थ की परियोजना है क्योंकि यह रुपये की क्रय शक्ति के अनुरूप नहीं है। मूल्यों के निर्धारण पर प्रभाव डालने का इसका जो गुण बताया जाता है, वह इसमें है ही नहीं। कीमतों के वर्तमान स्तर पर यह किसी तरह प्रभाव नहीं डाल सकता। न विनिमय को ऊंचा करने से भविष्य में कीमतें बढ़ने पर रोक लग जाएगी। इससे तो, केवल कीमतें मापने का आधार बदल जाता है। भविष्य में नई आधार रेखा को लेकर भी कीमतें उसी तरह आसानी से बढ़ जाएंगी, जिस तरह पहले पुरानी आधार रेखा से बढ़ती थीं। दूसरे शब्दों में मि. केन्स इस बात को अनदेखा कर गए हैं कि विनिमय केवल कीमतों के स्तर का सूचक होता है और इस पर नियंत्रण करने के लिए यह जरूरी है कि कीमतों के स्तर पर नियंत्रण रखा जाए न कि इसे एक नया नाम दे दिया जाए, जिसके वह अनुरूप न हो और जिस पर वह चल न सके जैसा कि 1920 में सिद्ध हो गया था जबकि कानूनी तौर पर रुपये का मूल्य 2 शिलिंग (स्वर्ण) कर दिया गया था जबकि व्यवहार में उसके 1 शिलिंग 4 पैंस स्टर्लिंग भी नहीं मिलते थे। इसका नतीजा यह निकला कि रुपये का विनिमय घट कर उस स्तर पर आ पहुंचा जो उसकी क्रय शक्ति द्वारा निर्धारित हुआ था। परन्तु इस प्रश्न के अतिरिक्त भी हमारे पास विनिमय मान के सबसे प्रखर समर्थक की स्वीकृति मौजूद है कि किसी मुद्रा प्रणाली का असली गुण सामान्य तौर पर वस्तुओं के रूप में मूल्य का मान स्थिर रखना होता है।

जब यह तय हो गया कि किसी मुद्रा प्रणाली के बारे में राय बनाने के लिए यह एक उचित कसौटी है, तो हमें यह प्रश्न पूछना चाहिए कि 1893 में टकसाल बन्द होने के बाद भारत में घटनाक्रम किस तरह चला? यह एक मूलभूत प्रश्न है तथापि विनिमय मान के गुणों की प्रशंसा करने वालों में से एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं है जिसने इस प्रश्न पर कोई ध्यान दिया हो। प्रो. केन्स, प्रो. केमेरेट अथवा मि. शिराज के पृष्ठ उलटने से भी यह पता नहीं चलेगा कि इस दृष्टि से विनिमय मान के बारे में उनका क्या मत है। चैम्बरलेन कमीशन ने या भारतीय करेंसी पर स्मिथ कमेटी ने भारत में कीमतों की समस्या ख्1, पर कभी भी कोई ध्यान नहीं दिया और अपने आप को इस बात पर संतुष्ट किए बिना यह समझना सचमुच कठिन है कि कोई भी वैसे उस मान की मजबूती या कमजोरी के बारे में कोई मूल्यवान राय दे सकता है।

  1. शायद बाद वाली कमेटी को इस बारे में अपवाद माना जा सकता है_ पर उसका उद्देश्य केवल ऊंचे

एक्सचेंज के लिए मैदान तैयार करना था।