260 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
केन्स को भी, जो विनिमय मान के दोषों को बढ़ा-चढ़ा कर नहीं देखते थे, उन्हें भी अपनी स्वतंत्र जांच से इस बात का विश्वास हो गया कि ख्1,
‘‘यूनाइटेड किंगडम के लिए सॉरबेक इंडेक्स नम्बर दिखाते हैं कि अन्य स्थानों की अपेक्षा भारत में होने वाले परिवर्तन कहीं अधिक हैं।’’
तब फिर इस मामले की पूर्व धारणा और तथ्यों में अंतर की क्या व्याख्या की जा सकती है। इसकी व्याख्या यह है कि वास्तविक विनिमय दरें दो मुद्राओं की सभी वस्तुओं के रूप में नहीं अपितु केवल कुछ वस्तुओं के रूप में क्रयशक्ति पर निर्भर करती है। इस संदर्भ में यह बेहतर होगा कि कुछ शर्तों सहित क्रयशक्ति समताओं का विनिमय दरों से सम्बंध के सिद्धांत को पुनः दोहराया जाए। इस सिद्धांत की बहुत यथार्थवादी परिभाषा यह होगी कि अंग्रेज और अन्य लोग भारतीय रुपयों का उतना ही मूल्य लगाएंगे कि भारतीय रुपयों से कहां तक और कितना ऐसा भारतीय सामान खरीदा जा सकता है जिनकी अंग्रेजों को आवश्यकता है। इसके मुकाबले भारतीय अंग्रेजी पौंड का उतना मूल्य लगाएंगे कि इन पौंडों से कहा तक और कितना ऐसा अंग्रेजी सामान खरीदा जा सकता है जिसकी भारतीयों को आवश्यकता है। इस तरह व्याख्या करने से यह स्पष्ट होता है कि वास्तविक विनिमय दरों का सम्बंध उस क्रय शक्ति से होता है जिससे अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार वाली वस्तुएं खरीदी जा सकती हैं। यह मान कर चलना कि वास्तविक विनिमय दरें दो मुद्राओं की सभी वस्तुओं के रूप में क्रयशक्ति पर निर्भर करती हैं, यह मानने के समान है कि किसी मुद्रा की क्रय शक्ति में परिवर्तन सभी वस्तुओं के रूप में होता है, चाहे उनका व्यापार होता हो या न होता हो। ख्2, निश्चय ही इन दोनों श्रेणियों के सामानों की कीमतों की फेरबदल की एक प्रवृत्ति होती है जो दीर्घकाल में एक-दूसरे को प्रभावित करती है_ जिससे कि यह करना संभव हो जाता है कि किसी मुद्रा की विनिमय दर उसकी आंतरिक क्रय शक्ति पर निर्भर करेगी। क्रय शक्ति समता का सिद्धांत विनिमय दरों की एक व्याख्या करने में उस हद तक महत्त्वपूर्ण है कि यह विदेशी विनिमयों पर नियंत्रण रखने के लिए व्यावहारिक उपयोगी सामान है और इसलिए इस अध्ययन के प्रारंभिक भाग में इस सिद्धांत का उपयोग रुपये का स्वर्ण मूल्य गिरने की व्याख्या करने के लिए किया गया था। किन्तु किसी मुद्रा की क्रय
- ‘दि इकोनॉमिक जर्नल’ के मार्च, 1909 के अंक में पृष्ठ 54 पर प्रकाशित लेख ‘दि रिसेंट इकोनॉमिक
ईवेंट्स इन इंडिया’
- विनिमय दरों से क्रय शक्तियों के सम्बंध के पुराने सिद्धांत के एक आधुनिक पक्षधर प्रो. कैस्वल यह
स्वीकार करते हैं कि दोनों में अनूकूलता इस अवधारणा पर आधारित है, क्योंकि वह कहते हैंµ‘‘क्रय
शक्ति समानता का हमारा गणित निश्चित रूपेण इस बात पर निर्भर करता है कि सम्बद्ध देशों में मूल्य
वृद्धि ने सभी वस्तुओं को एक जैसा प्रभावित किया है। परन्तु यदि यह शर्त पूरी नहीं होती तो वास्तविक
विनिमय दरें हिसाब लगाई गई क्रय शक्ति समताओं से अलग होंगी।’’ µ ‘‘मनी एंड फॉरेन एक्सचेंज
ऑफटर 1914’’ लन्दन, 1922, पृष्ठ 154