7. स्वर्ण मानक की ओर वापसी - Page 276

स्वर्ण मानक की ओर वापसी

261

शक्ति और उसके विनिमय मूल्य के संबंध पर आगे बढ़ने अथवा उसके आधार पर यह तर्क देना कि किसी विशेष समय पर विनिमय दर दो सामान्य मुद्राओं की सामान्य क्रय शक्ति का लगभग सही माप है, यह मान कर चलना है जो सदैव ठीक नहीं हो सकता अर्थात् व्यापार वाली वस्तुओं और बिना व्यापार वाली वस्तुओं की कीमतें एक-दूसरे की सहानुभूति में बदलती हैं। यह कल्पना बहुत ही व्यापक है और यह कहा जा सकता है कि परिस्थितियों के अनुरूप यह लगभग ठीक होती है। अब जैसा कि प्रो. केमरेर ने बताया है ख्1, µ

‘‘यद्यपि सम्पूर्ण रूप में भारत के निर्यात और आयात बहुत बड़े होते हैं_ पर

मुख्यतः भारत के लोग अपनी बनी वस्तुओं का ही इस्तेमाल करते हैं और इन

वस्तुओं का भी बड़ा भाग उत्पादन से लेकर खपत तक उस छोटे से क्षेत्र से

प्राप्त होता है जहां वे अपना जीवन बिताते हैं। विदेशी व्यापार स्वर्ण और स्वर्ण

विनिमय से उनका बहुत दूर का, नाममात्र का सम्पर्क होता है। हां, यदि समय

पाकर देश के आयात या निर्यात व्यापार के मूल्य संतुलन में कोई ठोस परिवर्तन

आए, तो उनका स्थानीय मूल्यों पर प्रभाव पड़ेगा_ परन्तु यदि अपवादों को छोड़

दिया जाए तो इन परिवर्तनों का प्रभाव बहुत धीमा होता है और इस लम्बी प्रक्रिया

में उसकी गति बहुत घट जाती है।’’

इन दोनों के बीच सम्पर्क क्योंकि बहुत ही क्षीण होता है_ इसलिए यह स्पष्ट है कि जो भारतीय वस्तुएं अंतर्राष्ट्रीय व्यापार का भाग बनती हैं_ उनकी कीमतें कुल मिलाकर सदैव उसके अनुपात में नहीं बदलतीं जितनी उन वस्तुओं की कीमतें जो अंतर्राष्ट्रीय व्यापार का भाग नहीं होतीं। इसके अतिरिक्त संबंध क्षीण होने के कारण वास्तविक विनिमय दरों के स्तर की अपेक्षा मुद्रा की सामान्य क्रय शक्ति भिन्न हो सकती है_ यहां यह बात ध्यान देने योग्य है कि जो भारतीय वस्तुएं मुख्यतः अंतर्राष्ट्रीय व्यापार का भाग बनती हैं_ उनकी कीमतें पूरी तरह देश में वस्तुओं और सेवाओं से प्रभावित नहीं होतीं। भारत से होने वाले निर्यातों में गेहूं, खालें, चावल और तिलहन अन्तर्राष्ट्रीय वस्तुएं हैं। युद्ध जैसी असामान्य घटनाओं को छोड़ दिया जाए, तो इन दोनों परिस्थितियों का मिला-जुला प्रभाव यह पड़ता है कि व्यापारिक और गैर-व्यापारिक वस्तुएं एक-दूसरे की सहानुभूति में तेजी से नहीं बदलती। ख्2,

यद्यपि विनिमय मान बनाए रखने का यह तात्पर्य जरूर होता है कि स्वर्ण के साथ रुपये की क्रय शक्ति समता बनाए रखे जाती है, परन्तु यह क्रय शक्ति समता सभी

  1. उल्लिखित देखें, पृष्ठ 64

  2. उक्त कथन पिछली बात को दोहराना मात्र ही है ताकि इस बात की व्याख्या की जा सके कि रुपये का

सामान्य मूल्य ”ास होने पर भी तत्काल उसका विशिष्ट मूल्य ”ास क्यों नहीं होता