272 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
इन तालिकाओं से दो तथ्य एकदम स्पष्ट हो जाते हैं। एक तो है कौंसिल बिलों की भारी मात्रा जिन्हें भारत सचिव बेचता है। टकसालें बन्द करने से पहले कौंसिल बिलों की बिक्री ‘‘होम चार्जेज’’ के आकार के अनुरूप बहुत घनिष्ठ रूप में चलती थी और वास्तविक रूप से निकाला गया रुपया बजट के अनुमानों से बहुत अधिक भिन्न नहीं होता था। टकसालें बन्द होने के बदले भारत सचिव द्वारा निकाला जाने वाला धन शुद्ध रूप से होम ट्रेजरी की आवश्यकताओं पर निर्भर नहीं करता था। टकसालें बन्द होने के बाद से भारत सचिव यह चेष्टा करता रहा है ख्1, µ
‘‘(1) वित्तीय वर्ष में भारत सरकार के खजानों से इतना धन निकालना जिसकी
बजट में वर्ष भर का काम चलाने के लिए व्यवस्था की गई है।
(2) इतना धन और निकालना जो सिक्के ढालने के लिए चांदी खरीदने के
लिए आवश्यक हो।
(3) इतना और धन निकालना जितना अकस्मात किसी बढि़या मौसम के
कारण सरकार बचा सके जो इंग्लैंड में ऋण चुकाने या ऋण से बचने
के काम आ सके।
(4) व्यापार की सुविधा के लिए अतिरिक्त बिल और ट्रांसफर बेचना।
(5) भारत पर टेलीग्राफिक ट्रांसफर जारी करना जो उन सॉवरेनों के भुगतान
के लिए हो जिन्हें भारत सचिव ने आस्ट्रेलिया से आते समय या मिस्र
से भारत आते समय खरीदा हो।’’
इस तरह निकालने का परिणाम यह निकलता है कि कौंसिल भारत का व्यापार संतुलन समायोजित करने में महत्त्वपूर्ण भाग अदा करते हैं_ होम ट्रेजरी का रोकड़ शेष बढ़ा देते हैं और भारतीय धन निधि लन्दन में बंध जाती है।
इन तालिकाओं में जो दूसरी बात पर ध्यान दिया जाना चाहिए वह यह है कि भारत सचिव किन कीमतों पर यह बिक्री करता है। टकसालें बन्द होने से पहले कौंसिल बिलों की कीमतों पर भारत सचिव का कोई नियंत्रण नहीं होता था_ इसलिए उसे साप्ताहिक बिक्री के समय सबसे ऊंची बोली देने वाले की कीमत माननी पड़ती थी। परन्तु अब इस बात पर आपत्ति की जाती है कि जब टकसालें
- तुलना करेंµ एफ.डब्ल्यू. न्यामार्च द्वारा चेम्बरलेन कमीशन को दिये गए ज्ञापन, खण्ड- I, नं. VII, पृष्ठ
222