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स्वर्ण मानक की ओर वापसी

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के सामान्य काम-काज में हस्तक्षेप करता था।’’ इन तीनों विकल्पों ख्1, में से भारत पर बिलों की बिक्री को ही सबसे उपयुक्त विकल्प समझा गया और जब ब्रिटिश ताज ने कम्पनी से भारत सरकार का कार्यभार सम्भाल लिया तो भारत सचिव अर्थात् सेक्रेटरी ऑफ स्टेटइन कौंसिल ने इसे जारी रखा और इसी से इसका नाम कौंसिल बिल पड़ गया। भारत सचिव के हाथों में कौंसिल बिल में कुछ संशोधन हुए। अब यह बिक्री साप्ताहिक आधार ख्2, पर की जाती है और इसकी व्यवस्था बैंक ऑफ इंग्लैंड की मार्फत की जाती है जो हर बुद्धवार को भारत सचिव की ओर से एक विज्ञापन प्रकाशित कराता है कि आगामी बुद्धवार तक बम्बई या कलकत्ता या मद्रास में मांग पर भुगतान किए जाने वाले बिलों के लिए निविदाएं आमंत्रित की जाती हैं। जिस कीमत पर ये टेंडर स्वीकार किए जाते हैं_ वे अब पैनी के 1/32वें भाग तक निर्धारित की गई हैं। ख्3, कौंसिल बिल एक ही प्रकार का नहीं होता जैसा कि पहले होता था। उसके मुकाबले अब इन बिलों के चार वर्ग होते हैंµ (1) सामान्य बिल ऑफ एक्सचेंज, जो हर बुद्धवार को बेचे जाते हैं और जिन्हें ‘‘कौंसिल’’ कहा जाता है_ (2) तार द्वारा अंतरण ख्4,, जो बुद्धवार को बेचे जाते हैं और जिन्हें संक्षेप में ‘‘ट्रांसफर’’ कहा जाता है_ (3) सामान्य एक्सचेंज बिल, जिन्हें बुद्धवार के अतिरिक्त सप्ताह में किसी भी दिन बेचा जाता है, इन्हें ‘‘इंटरमीडिएट’’ कहा जाता है_ और (4) तार द्वारा अंतरण जिन्हें बुद्धवार के अतिरिक्त किसी भी दिन बेचा जाता है और जिन्हें ‘‘स्पेशल’’ का नाम दिया गया है। अब भारत सचिव किस तरीके से अपने कौंसिल बिलों की मशीनरी का उपयोग करता है जिससे स्वर्ण को भारत में जाने से रोका जा सके? कहा जाता है कि बिक्री की कीमत और आकार की इस तरह व्यवस्था की जाती है कि स्वर्ण भारत नहीं जा पाता। इस बात की जांच करने से पहले कि इससे फाउलर कमेटी की नीति को किस हद तक असफल कर दिया गया था, आगामी पृष्ठों पर दी गई तालिका- LI और II इसे समझा जा सकता है।

  1. एक चौथा विकल्प भी था, भारत सरकार लन्दन पर भारत में स्टर्लिंग बिल खरीदती थी और वसूली

के लिए उन्हें भारत मंत्री को भेज देती थी। यह विकल्प 1877 में कुछ समय के लिए अपनाया परन्तु

बाद में इसे छोड़ दिया गया

  1. 22 जनवरी, 1862 से, जब पहली बार भारत मंत्री के प्राधिकार के अंतर्गत कौंसिल बिलों की बिक्री

शुरू हुई, नवम्बर, 1862 तक यह बिक्री मासिक आधार पर की जाती थी। नवम्बर, 1862 से यह बिक्री

पाक्षिक आधार पर की जाने लगी और अगस्त, 1876 से इसे साप्ताहिक बना दिया गया। 3. जनवरी से मार्च, 1862 तक न्यूनतम भिन्न एक र्फार्दंग होती थी, मार्च, 1862 से इसे घटा कर पैनी

का 1/8वां भाग कर दिया गया, जनवरी, 1875 से 1/16वां भाग और 1882 में 1/32वां भाग कर दिया

गया जो अब तक चल रहा है।

  1. पहले-पहल 1876 में लागू।