1. दोहरे मानक से रजत मानक तक - Page 30

अध्याय एक

दोहरे मानक से रजत मानक तक

निजी संपत्ति और वैयक्तिक लाभ की आकांक्षा पर आधारित व्यापार, समाज का एक महत्वपूर्ण अंग है जिसके बिना इसके सदस्यों के लिए अपने श्रम से निर्मित विशेष उत्पादों का वितरण कठिन होगा। निश्चय ही लाटरी अथवा एक प्रशासकीय मुक्ति इसकी प्रवृत्ति के विरूद्ध होगी। वास्तव में यदि इसे अपना स्वरूप अक्षुण्ण रखना है तो पृथक उद्योग के उत्पादों के आवश्यक वितरण के लिए केवल एक ही रास्ता है, वह है निजी व्यापार का। परंतु अनिवार्यतः एक व्यापारिक समाज धन केन्द्रित समाज होता है एक ऐसा समाज जो आवश्यकतानुसार अपना लेन/देन मुद्रा द्वारा संपन्न करती है। वास्तव में, यह वितरण मुख्यतः उत्पादों से उत्पादों का विनिमय नहीं होता वरन् मुद्रा के बदले उत्पाद होता है। अतः इस प्रकार के समाज में मुद्रा ऐसी धुरी बन जाती है जिस पर सभी कुछ घूमता है।

समस्त मानवीय प्रयासों, रुचियों, इच्छाओं और आकांक्षाओं का केंद्र बिंदु धन है, अतएव व्यापारिक समाज मूल्य की दुनिया में कार्य करने को बाध्य है, जहां सफलताएं और असफलताएं उत्पादन मूल्य की अपेक्षा उत्पादन लागत के मध्य सूक्ष्म परिगणना पर आधारित होती है।

अर्थशास्त्रियों ने निस्संदेह इस बात पर बल दिया है कि मूलभूत रूप से धन से बढ़कर अन्य कोई वस्तु महत्वपूर्ण नहीं हो सकती। जो अपने सर्वोत्तम रूप में एक ऐसा विशाल चक्र है जिसके माध्यम से समाज के प्रत्येक व्यक्ति के लिए उसके जीवन निर्वाह, सुख-सुविधाओं ओर आमोद-प्रमोद के साधनों का उचित अनुपात में नियमित रूप से वितरण होता रहता है। अर्थशास्त्र की दृष्टि से धन का मूल्यांकन निश्चित रूप से परिभाषित किया जा सकता है कि नहीं यह एक खुली चर्चा का विषय है। परंतु इतना सुनिश्चित है कि धन के प्रयोग के बिना ‘‘जीवन निर्वाह, सुख-सुविधाएं और

ऽ डब्यू सी. मिचैल, ‘‘द रैशनेलिटी ऑफ इकनामिक एक्टीविटी’’ जर्नल ऑफ पालिटिकल कोनैमी, 1910,

खंड 18, पृष्ठ 97 और 197 साथ ही देखें उन्हीं द्वारा लिखित ‘‘दि रोल ऑफ मनी इन इकनामिक

थियोरी’’, अमेरीकन इकनामिक रिव्यू (सप्लीमेंट) खंड 6, नं.1 मार्च, 1916