1. दोहरे मानक से रजत मानक तक - Page 31

16 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

आमोद-प्रमोद के साधनों का यह वितरण’’ साधारणतया उपलब्ध होना तो दूर, यदि पूर्ण रूप से स्थगित न भी हुए तो, बड़ी दुखद स्थिति में अवरूद्ध अवश्य होंगे। मुद्रा के अभाव में क्या उत्पादों का व्यापार संभव है? वस्तु-विनिमय की कठिनाइयां सभी अर्थशास्त्रियों के लिए एक स्थायी चुनौती बन गई है, इसमें वे अर्थशास्त्री भी सम्मिलित हैं, जो इस बात पर दृढ़ थे कि मुद्रा मात्र एक आवरण है। वस्तु-विनिमय की कठिनाइयों का निराकरण करके मुद्रा न सिर्फ व्यापार को सरल बनाने के लिए आवश्यक है, वरन् विशिष्टता प्रदान करके उत्पादन में वृद्धि के लिए भी जरूरी है। क्योंकि उसके निमित्त विशिष्टता के लिए कौन चिंता करेगा यदि वह अपने उन उत्पादों का व्यापार अन्य व्यक्तियों के उन उत्पादों के साथ करने में समर्थ नहीं हो सका जिनको कि वह चाहता था? व्यापार उत्पादन का सेवक है। और यदि व्यापार की समृद्धि नहीं हो सकती तो उत्पादन ही मुरझा जाएगा। अतः यह स्पष्ट है कि यदि व्यापारी समाज को जीवित रहना है और विशिष्ट उद्योग में अधिकतम लेन-देन के फलस्वरूप स्वतः अनगिनत लाभों का रसास्वादन करना है तो मुद्रा की ठोस पद्धति अपनानी होगी। ख्1,

मुगल साम्राज्य की समाप्ति पर भारत को यदि तत्कालीन मानदंडों से देखा जाए तो भारत आर्थिक रूप से एक उन्नत देश था। इसका व्यापार विस्तृत था, इसकी बैंकिंग संस्थाएं सुविकसित थीं और इसके लेन-देन में साख की सराहनीय भूमिका थी। परंतु विनिमय का माध्यम और मूल्य का आम मानक अन्य बातों के साथ भारतीय जनता की अर्थव्यवस्था में सबसे अधिक अभावग्रस्त प्रतीत होता रहा जब भारतीय जनता अठारहवीं शताब्दी के मध्य में ब्रिटिश शासन के आधिपत्य में आई। इस घटना के प्रादुर्भाव से पूर्व भारत की मुद्रा सोना और चांदी दोनों में ही थी। हिन्दू सम्राटों के अधान सोने पर जोर दिया गया था जबकि मुसलमान बादशाहों के शासन में परिचालन-माध्यम के रूप में चांदी का प्रमुख स्थान था। [†] भारत में मुगल साम्राज्य में आर्थिक प्रणाली के जन्मदाता अकबर के समय से मुद्रा की इकाई सोने की मोहर तथा चांदी का रुपया थी। मोहर और रुपया दोनों ही सिक्कों का समान भार अर्थात् 175 ग्रेन ट्राय [‡] था और दोनों ही सिक्कों को किसी धातु के मिश्रण के बिना ढाला जाता था अथवा कम से कम ये दोनों सिक्के शुद्ध माने जाते थे। [§] परंतु क्या उनका मूल्य एकाकी मानक का था या नहीं था, यह बात संदेहास्पद है। यह विश्वास किया जाता है कि मोहर और रुपया दोनों ही उस समय मूल्य के आम साधन थे और उन दोनों में कोई भी साधन निर्धारण विनिमय की दर के बिना परिचालित किया जाता था। अतः यह मानक इस प्रकार का था जिसे जेवान्स ने दोहरे

1 इस संपूर्ण बहस के लिए द्रष्टव्य एच.जे.डेवेन पोर्ट कृत ‘दि इकॉनामिक्स ऑफ इंटरप्राइज’ (1913)

चैप्टर 2 एवं 3

† प्रिंसेप, जे., उपयोगी तालिका, कलकत्ता 1834 पृष्ठ 15-16

‡ राबर्ट चालमर्स ‘‘हिस्ट्री ऑफ कोलोनियल करेंसी’’ 1893 पृष्ठ 336-340 § डॉ. पी. केल्ली ‘‘यूनिवर्सल केम्विस्ट, 1811, पृष्ठ 115