302 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
केमेरेर का कहना है कि इसी प्रकार का लाभ अपरिवर्तनीय मुद्रा के उपयोग से भी जुड़ा होता है, अपितु उससे भी ज्यादा बड़े पैमाने पर जुड़ा होता है क्योंकि प्रतिदान निधि के लिए तो मूल मुद्रा की आवश्यकता ही नहीं होती जैसी कि परिवर्तनीय मुद्रा में होती है। ऐसे विचारों के कारण ही प्रो. केन्स ने राय दी कि भारतीय मुद्रा प्रणाली मितव्ययिता का एक शानदान नमूना है और दूसरे अधिक प्रगतिशील देशों को इस उदाहरण से लाभ उठाना चाहिए। इस आधार पर हम इस दुखद निष्कर्ष पर नहीं पहुंचेंगे कि प्रो. केमेरेर या प्रो. केन्स यह भी सिफारिश कर देंगे कि अपरिवर्तनीय कागजी मुद्रा सबसे अधिक मितव्ययी होती है, इसलिए देश को इसे बिना किसी पछतावे के अपना लेना चाहिए। यहां हमारा तात्पर्य तो यह पता लगाना है कि क्या रुपया मुद्रा वास्तव में मितव्ययी है। जब हम रुपये के अस्तित्व में आने की प्रक्रिया का सावधानीपूर्वक विश्लेषण करते हैं तो इस तर्क को गंभीरतापूर्वक लेना कठिन हो जाता है कि भारतीय मुद्रा मितव्ययी है। सबसे पहले तो भारत सचिव को लंदन में कौंसिल बिलों के लिए सोना देना पड़ता है या भारत में भारत सरकार को करों की अदायगी या अन्य मदों के लिए सोना देना पड़ता है। इस सोने से भारत सचिव चांदी
खरीदता है और रुपये के सिक्के बनाता है। चूंकि चांदी की कीमत अनुपात से नीचे होती है, इसलिए रुपये की लागत कीमत और सोने में इसकी बिक्री कीमत में अंतर होता है। इसमें जितना अंतर होता है यह सही है कि वह तो प्राप्ति होती है। परंतु सिक्के ढालने से होने वाले इे प्राप्ति या लाभ से समाज का कोई कल्याण नहीं होता। यह तो जमाखोरी होती है और उस दृष्टि से यह सम्पदा का फालतू अव्यावहारिक रूप होता है। यदि इस लाभ का उपयोग समाज के किसी वर्तमान काम या उद्देश्य के लिए नहीं किया जा सकता_ तो फिर रुपये के सिक्के ढालने का क्या लाभ? इसलिए यह बात स्पष्ट है कि जब तक यह लाभ भारत के राजस्व स्रोतों से अलग रखा जाता है, तब तक रुपये के सिक्के बनाने में नाम को भी मितव्ययता नहीं होती। एक दूसरी दृष्टि से तो भारत की मुद्रा समाज के लिए एक फालतू की परिसम्पदा है। धातु की मुद्रा मूल रूप से एक पूंजीगत सामान होता है जो एक सामाजिक निवेश का रूप लेता है। फलतः यह देखना आवश्यक होता है कि मुद्रा का पूंजीगत मूल्य बना रहे यह बड़ी प्रसन्नतादायक स्थिति है कि भारत सरकार कागजी मुद्रा रिजर्व के संदर्भ में समस्या के इस पहलू से अनजान नहीं है और अभी हाल में इसका पूंजीगत मूल्य बनाए रखने के लिए इसने एक मूल्य ह्रास निधि बनाई है। ख्1, अब जो बातें कागजी मुद्रा पर लागू होती हैं, वे रुपया मुद्रा पर भी लागू होनी चाहिए। क्या
- तुलना करेंµ इंडियन पेपर करेंसी (अमेंडमेंट) बिल पर वित्त मंत्री मि. हेली का भाषण, दिनांक 16
सितम्बर, 1920, एस एल सी पी खंड- LIX] पृष्ठ 308-09