स्वर्ण मानक की ओर वापसी
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जा सकती। सारे धन की आवश्यकता व्यापार या सेवाओं के लिए होती है, परंतु सारा धन मुद्रा में नहीं रखा जाता। वास्तव में सभी वस्तुओं का धन से विनिमय किया जा सकता है क्योंकि यह माना जाता है कि धन के साथ यह विकल्प हमेशा रहता है कि उसे गैर-मौद्रिक कार्यों के लिए प्रयुक्त किया जा सकता है। रुपये के मामले में उपयोग के विकल्प नहीं होते। फलतः यद्यपि रुपया व्यापार की मांग पर जारी किया जाता है, परंतु चाहे इसकी जरूरत हो या न हो, यह मुद्रा के रूप में बना रहता है और इस तरह इसका मूल्य ह्रास होने लगता है। इस मूल्य ह्रास की संभावना से वे लोग भी इंकार नहीं करते जो यह कहते हैं कि रुपये केवल व्यापार की मांग पर जारी किए जाते हैं_ नहीं तो भला वे इस बात के लिए इतने उत्सुक क्यों होते कि देश का स्वर्ण रिजर्व बढ़ा दिया जाए। परन्तु रुपया मुद्रा को खतरा सिर्फ सरकार की अविवेकपूर्ण नीति की संभावना से नहीं है। सरकार के अतिरिक्त, भारत में ऐसे राजनेता हैं, जो अपने देशवासियों के कल्याण में रूचि लेते हैं, उन्होंने सरकार की कई अवसरों पर भर्त्सना की है कि वह रुपये के सिक्के ढालने से होने वाले लाभ का उपयोग देश की नैतिक और भौतिक प्रगति के लिए क्यों नहीं करती। ख्1, और 1907 में रुपये ढालने से होने वाले लाभ का उपयोग तो वास्तव में रेलों के विस्तार में किया गया। ऐसे कार्यों के लिए मुद्रा का गलत ढंग से उपयोग करने के जो अवश्यम्भावी परिणाम निकलेंगे, उससे हर व्यक्ति भयाक्रांत और निराश हो जाएगा। क्या अब समय नहीं आ गया है कि खतरे और प्रलोभन के इस स्रोत को दूर करने के लिए सरकार को रुपया मुद्रा की व्यवस्था करने से वंचित कर दिया जाए? परंतु ऐसा करने के उपाय क्या हैं? यदि इसकी प्रबंध व्यवस्था को दूर करना वांछनीय है, तो परिवर्तनीयता एक अपर्याप्त कदम होगा_ क्योंकि परिवर्तनीय होने से तो रुपया फिर भी एक व्यवस्था की जाने वाली मुद्रा बना रहेगा। केवल रुपया मुद्रा ढालना पूर्णतया बंद कर देने से ही भारतीय मुद्रा की प्रबंध व्यवस्था में सरकारी हस्तक्षेप रोका जा सकेगा_ और इसलिए हमें इस बात की मांग अवश्य करनी चाहिए।
चाहे यह बात सनक से भरी हुई लगे, परंतु सुरक्षा अपरिवर्तनीय रुपये में ही है जिसके जारी किए जाने की एक निश्चित सीमा हो।
- स्वर्गीय श्री गोरवले जैसे संयत और गंभीर राजनेता ने इस दिशा में पहल की थी। तुलना करेंµ 1907-8
के फाइनेंशियल स्टेटमेंट में उनका भाषण, पृष्ठ 203-4_ और वही भूल प्रो. वी.जी. काले ने अपनी
पुस्तक करेंसी रिफॉर्म इन इंडिया 1919, पृष्ठ 65 पर दोहराई है।