7. स्वर्ण मानक की ओर वापसी - Page 323

308 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

केवल व्यापार की मांग को पूरा करने के लिए जारी की जाती है, तब फिर जरूरत से अधिक जारी किए जाने की आशंका क्यों होती है? इस सिद्धांत पर चलने वाली सरकार बिना किसी पछतावे के अनिश्चित मात्रा में मुद्रा बढ़ाती जाएगी। इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरा हुआ है जब ऐसे अधकचरे सिद्धांतों के आधार पर मुद्रा की व्यवस्था करने से कितना विनाश हुआ। ख्1, यह देश का सौभाग्य है कि, देश की कागजी मुद्रा जिसका आधार 1920 में सरकार द्वारा बदल दिया गया, या यों भी कहा जा सकता है कि गलत ढंग से छेड़छाड़ की गई, परंतु अभी भी वह ऐसी मुद्राओं 295 से दूर थी जिनका वित्तमंत्री द्वारा व्यक्त सिद्धांत द्वारा नियमन किया जाता है। टकसाल बंद होने के बाद से ही भारतीय मुद्रा, देशवासियों के कल्याण के लिए सबसे बड़ा खतरा बन गई है, विशेष कर उस सिद्धांत के कारण जिसके आधार पर यह जारी की जाती है। यह सचमुच आश्चर्य की बात है कि इस सिद्धांत को प्रो. केन्स ख्2,, मि. शिराज ख्3, और चैम्बरलेन कमीशन ख्4, जैसे प्रतिष्ठित विद्वानों आदि का समर्थन प्राप्त है, तथापि सरकार को भारतीय मुद्रा की व्यवस्था करने की शक्ति से वंचित नहीं किया जा सकता, क्योंकि यह सिद्धांत अनिवार्यतः युक्ति संगत नहीं है। यह तर्क दोषपूर्ण है कि रुपयों का आधिक्य हो ही नहीं सकता क्योंकि वे व्यापार की मांग पर जारी किए जाते हैं, परन्तु यह तर्क मुद्रा के विशिष्ट गुणों के कारण ठहर नहीं सकता। धन की चाहत इसलिए कही जाती है क्योंकि मुद्रा में क्रय शक्ति होती है। यह निस्संदेह सच है परंतु इससे इस बात की ठीक से व्याख्या नहीं होती कि लोग हर समय मुद्रा की इतनी मांग क्यों करते रहते हैं, हालांकि उनको यह पता होता है कि मुद्रा का मूल्य इतना अस्थिर होता है। वास्तव में यदि क्रयशक्ति ही एकमात्र कारण होता तो खरीद के लिए मुद्रा की इतनी इच्छा न होती। इस इच्छा का कारण इस तथ्य से समझ आता है कि अन्य वस्तुओं के मुकाबले मुद्रा का एक और विशिष्ट लाभ यह होता है कि इसमें, मेजर के शब्दों में, विक्र्रय योग्य होने का अधिकतम गुण होता है। किसी सौदे में खरीदना आसान होता है, बजाय किसी सौदे में बेचने क,े यह इसी बात को दूसरी तरह कहने के समान है कि हर व्यक्ति अपने साधन सर्वाधिक बिक्र्री योग्य धन अर्थात मुद्रा के रूप में रखना चाहता है। इस दृष्टि से यह कहना बिल्कुल सत्य है कि मांग से ज्यादा मुद्रा जारी नहीं की जा सकती। परंतु इससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि किसी विशेष समय पर केवल मुद्रा की आवश्यकताओं के लिए अधिक मुद्रा जारी नहीं की

  1. तुलना करेंµई.आर.ए. सेलिगमेन, करेंसी इनफलेमेशन एंड पब्लिक डेट्स, न्यूयार्क, 1922

  2. पूर्वोक्त पुस्तक, पृष्ठ 111

  3. पूर्वोक्त पुस्तक, पृष्ठ 39

  4. पूर्वोक्त पुस्तक, पैरा 66