साक्ष्य पर वक्तव्य
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- रुपये के मूल्य में वृद्धि तथा ह्रास का व्यापार तथा उद्योग पर पड़ने वाले
प्रभाव का जहां तक संबंध है, उसके विषय में जिस बात की प्रायः तलाश
की जाती है वह यह है कि निम्न विनिमय व्यापार तथा उद्योग को आनुतोषिक
प्रदान करता है। परंतु यह महत्वपूर्ण बात नहीं है। इससे अधिक महत्वपूर्ण
बात यह है कि मान लीजिए कि निम्न विनिमय से लाभ प्राप्त होता है, तो
यह लाभ कहां से आता है? अधिकांश व्यापारी ऐसा कहते हैं कि यह निर्यात
व्यापार के लिए लाभ है और बहुत से लोगों का इसमें यह अंधाधुंध विश्वास
था कि यह कहा जा सकता है कि यह सबके लिए सामान्यतः एक विश्वास
की वस्तु हो गयी थी कि निम्न विनिमय समूचे राष्ट्र के लिए लाभ का स्रोत
है। अब यदि यह महसूस करें कि निम्न विनिमय का अर्थ आंतरिक मूल्यों
का अधिक होना है तो यह बात एकदम स्पष्ट हो जाएगी कि यह लाभ राष्ट्र
के लिए बाहर से आने वाला कोई लाभ नहीं है, बल्कि यह देश के अंदर,
दूसरे वर्ग की कीमत पर, एक वर्ग से प्राप्त होने वाला लाभ है। जो वर्ग
हानि उठाता है, वह निर्धन श्रमिक वर्ग होता है जो धनी या व्यापारी वर्ग को
आनुतोषिक प्रदान करता है। निर्धन से धनी के हाथों में संपदा या धन का
ऐसा हस्तांतरण, कभी-कभी देश के सामान्य हित में नहीं होता। अतएव, मैं
उच्च व अधिक मूल्यों तथा निम्न व कम विनिमय का प्रबल विरोधी हूं और
किसी भी अच्छी न्यायसंगत व नेक सरकार को, देश में निर्धन वर्ग की इस
प्रकार गुप्त रूप में जेब काटने का काम नहीं करना चाहिए।
- अब मैं भारत में मुद्रा बाजार की मौसमी आवश्यकताओं के लिए व्यवस्था
करने के प्रश्न पर आता हूं। मुद्रा प्रणाली को स्थिर तथा मूल्य सापेक्ष व
लचकदार होना चाहिए और यही कारण है कि अनेक देशों में मुद्रा धातु
तथा कागज का मिश्रण होता है। उसमें पहला उसे दृढ़ता तथा स्थिरता प्रदान
करने के लिए होता है और दूसरा लचक प्रदान करने के लिए होता है।
दुर्भाग्यवश, भारत में कागज की मुद्रा की योजना उसे लचक प्रदान करने के
लिए नही हैं। इंग्लैंड में इसी प्रकार की कागज की मुद्रा के विकास द्वारा
उपयोगी बनाया जाता है, इस निक्षेप मुद्रा को अच्छे वाणिज्यिक कागज के
प्रति जारी किया जाता है। अनेक प्रकार के कारणों से, निक्षेप, मुद्रा, भारत
में अपनी जड़ जमाने में असफल रही है और इसके फलस्वरूप, भारत की
कागज की मुद्रा की अनम्यता में कोई कमी नहीं आई है। इसलिए हमें अपनी
कागज की मुद्रा की निधि को बढ़ाने के लिए और अधिक प्रावधान करना
चाहिए जिससे उत्तम वाणिज्यिक कागज को, मौसमी मांगों की आवश्यकता
के अनुरूप मुद्रा में परिवर्तित करना संभव हो सके।
स्पृश्यों तथा अस्पृश्यों के बीच एकता कानून के बल पर नहीं लाई जा सकती।. ......केवल प्रेम ही उन्हें एकता के सूत्र में पिरो सकता है।
µभीमराव अम्बेडकर