322 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
का वह स्तर भी प्रदान करेगी जिसके हम बहुत दिनों से अभ्यस्त थे। ये दोनों विचार भ्रामक हैं। प्रथम युद्ध से पूर्व की व समानता की पुनर्स्थापना, युद्ध से पूर्व के मूल्य स्तर की पुनः स्थापना नहीं है। क्योंकि यह बात याद रखने योग्य है कि यदि क्रय शक्ति के रूप में मापा जाए तो 1925 में 1 शि. 4 पैंस सोना 1914 के 1 शि. 4 पैंस सोने के समान नहीं हैं। विनिमय के उसी अनुपात का अर्थ वास्तव में क्रयशक्ति का वही स्तर नहीं है। दो मुद्राओं के बीच अनुपात तो वही रह सकता है, यद्यपि उनकी अलग-अलग मात्रा में बहुत बड़ा परिवर्तन हो चुका होता है, बशर्ते कि मात्रा विभिन्नता समान तथा उसी अर्थ में हो। यह वास्तव में युद्ध से पूर्व की सममूल्यता की नाममात्र की पुनः स्थापना का परिणाम है। यदि युद्ध से पूर्व की समानता को पुनः स्थापित करने का अर्थ, युद्ध से पूर्व के मूल्यों के स्तर को पुनः स्थापित करना है तो उस अनुपात को 1 शि. 6 पैंस से 1 शि. 4 पैंस की दिशा में कम करने के बजाए, 2 शि. सोने की दिशा में बढ़ाना चाहिए। दूसरे शब्दों में मुद्रा की आगे और अपस्फीति होनी चाहिए। द्वितीय युद्ध से पूर्व की समानता की पुनः स्थापना चाहे नाममात्र की हो, पर वह अनुचित होगी। आस्थगित भुगतान के एक मानक के रूप में मुद्रा को धन संबंधी संविदाओं में गड़बड़ नहीं करनी चाहिए। यदि, इस समय विद्यमान सभी ऋणों को युद्ध से पहले, 1914 में संकुचित कर दिया जाता, तो आदर्श न्याय के लिए युद्ध से पूर्व के अनुपात को पुनः स्थापित करने की स्पष्टतः आवश्यकता होगी। इसके विपरीत, यदि सभी विद्यमान संविदाएं 1925 में की जातीं तो न्याय के लिए यह अपेक्षित होता कि हम 1925 के अनुपात को रखें। इस संबंध में दो बातों को ध्यान में रखना चाहिए। विद्यमान संविदाओं में वे संविदाएं शामिल हैं जो मूल्य ह्रास तथा मूल्य वृद्धि से पहले प्रत्येक अवस्था में की गईं और सबको ठीक प्राकार से निपटाने के लिए यह अपेक्षित होगा कि प्रत्येक पर अलग-अलग कार्रवाई की जाए यह ऐसा कार्य है जो उसकी जटिलता तथा विशाल के कारण असंभव है। इसमें संदेह नहीं कि विद्यमान संविदाओं की अवधि अलग-अलग है। परंतु उनमें से अधिकांश हाल की अर्थात बहुत नवीन हैं और संभवतः एक वर्ष से अधिक की नहीं हैं। जिससे यह कहा जा सकता है कि कुछ संविदात्मक दायित्वों का गुरूत्व केन्द्र हमेशा वर्तमान के निकट होता है। ये दो तथ्य बताने के बाद, सबसे उत्तम समाधान यह होगा कि 1 शि. 4 पैंस तथा उत्पन्न किया जाए और यह देखा जाए कि वह 1 शि. 6 पैंस के दूर है। यह तत्वतः प्रो. फिशर का भी मत है। उनका यह कहना है कि ‘‘मुद्रा के उचित मान की समस्या, पीछे नहीं बल्कि आगे देखती है। इसे अपना प्रारंभ इस समय प्रचलित व्यापार से करना चाहिए, युद्ध से पूर्व के काल्पनिक अंकित मूल्यों से नहीं। कोई व्यक्ति यूनान तथा रोम के मुद्रा मानों पर लौटने या चांदी के मूल पाउंड को पुनः स्थापित करने के संबंध में भी कह सकता है।’’ संक्षेप में, मुद्रा के मामलों में, वास्तविक मुद्रा सामान्य होती है और इसलिए वह उचित है।