1. दोहरे मानक से रजत मानक तक - Page 59

44 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

वस्तुओं के लिए यूरोप को प्रतिवर्ष लाखों की राशि भिजवाई जानी थी, उस समय भारत के प्रत्येक भाग में इस क्रांति के घातक परिणाम देखे गए। ऐसी प्रचुर जल-धारा से वंचित होने के बाद नदी शीघ्र ही अपने किनारों से हट गई तथा अपने अधिक बहते हुए जल से समीपी खेतों को उर्वर बनाना बंद कर दिया।’’

अब केवल यही मार्ग खुला था और जब बहुमूल्य धातुओं की प्राप्ति के लिए निषेधाज्ञाओं को हटाया गया तब इस कर की राशि की अपेक्षा अधिक सामान भेजना था ताकि उनमें संतुलन लाया जा सके। यह तभी संभव हुआ जब पील ने भारतीय सामान को कम कर पर स्वीकार किया तथा देश प्रथम बार अपनी बढ़ती आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए बहुमूल्य धातुओं की प्रचुर मात्रा लेने में समर्थ हो पाया। परंतु मुद्रा के रूप में काम करने के लिए इन बहुमूल्य पदार्थों की आपूर्ति की सुविधा अल्पकाल की थी। 1850 के बाद की कठिनाइयां बहुमूल्य धातुओं के प्राप्त करने के लिए भारत के मार्ग में अवरोध नहीं बनीं। अवरोध तो दूर रहा, बहुमूल्य धातुओं का निर्यात और आयात पूर्ण रूप से स्वतंत्र था तथा उन्हें प्राप्त करने के लिए भारत की क्षमता भी काफी थी बहुमूल्य धातुओं की किसी प्रकार की कोई कमी की कठिनाई नहीं थी क्योंकि तथ्य यह था कि 1850 के बाद बहुमूल्य धातुओं की वृद्धि काफी थी। इस कठिनाई के लिए भी स्वयं भारत उत्तरदायी था तथा इसका कारण यह था कि भारत ने उस बहुमूल्य धातु पर अपनी मुद्रा को आधारित नहीं किया था। जो वह सरलता से प्राप्त कर सकता था। 1835 के अधिनियम को भारत ने नितांत चांदी के आधार पर रख दिया परंतु दुर्भाग्यवश 1850 के बाद ऐसा हुआ यद्यपि बहुमूल्य धातुओं के कुल उत्पाद में वृद्धि हुई जबकि विश्व की आवश्यकताओं के अनुसार चांदी में वृद्धि नहीं हुई तथा उसका अधिकांश भाग चांदी पर आधारित था अतः भारत अपनी मुद्रा के कानून के फलस्वरूप मुद्रा के संकुचन के साथ फैलते व्यापार की अजीब सी स्थिति मेंं फंसा रहा जैसा कि पृष्ठ 31 की तालिका IV में दिखाया गया है।

देखने में ऐसा लगता है कि मुद्रा की कठिनाई नही होनी चाहिए थी। चांदी का अधिक आयात था वही स्थिति इसके सिक्कों की भी थी। ऐसी स्थिति में कठिनाई क्यों हो गई? इस प्रश्न का उत्तर ढूंढ़ने के लिए दूर जाने की आवश्यकता नहीं है। यदि चांदी के ढाले गए सिक्कों का परिचालन बनाए रखा गया होता तो संभव है कि यह कठिनाई की स्थिति में पैदा न होती। भारत पहले ही से बहुमूल्य धातुओं के रखने के लिए बदनाम है। परंतु इस प्रक्रिया की व्याख्या के लिए श्री कैसेल्स द्वारा दी गई चेतावनी को याद रखना होगा, जो इस प्रकार हैः

‘‘इसके चांदी के सिक्कों को विनिमय के माध्यम के रूप में वाणिज्य की

आवश्यकताओं की पूर्ति ही नहीं करनी थी अपितु चांदी के आभूषण आदि

बनाने वाले और सुनार के लिए उस धातु के पर्याप्त रूप से आपूर्ति करने की