दोहरे मानक से रजत मानक तक
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गया और अंत में सर रॉबर्ट पील ने 1842 की संशोधित कर पद्धति द्वारा लगाए गए कम करों को भारत के उत्पादों के लिए स्वीकार कर लिया। नौचालन के कानून को निरस्त करने से भारतीय वाणिज्य के विस्तार को अधिक प्रोत्साहन मिला। इसके साथ ही भारतीय उत्पादों के मांग भी बढ़ने लगी। 1854 के क्रीमियन युद्ध ने रूस की आपूर्तियों को रोक दिया और उनके स्थान पर भारतीय उत्पाद लिए जाने लगे तथा 1853 में यूरोप भर में रेशम की फसल के खराब होने के फलस्वरूप एशिया तथा भारत के रेशम की मांग बढ़ गई।
इन दोनों परिवर्तंनों का प्रभाव मुद्रा संबंधी स्थिति पर स्पष्ट ही था। दोनों ने ही नकदी की अधिक मांग की। परंतु नकदी को प्राप्त करना कठिन कार्य था। भारत काफी मात्रा में बहुमूल्य धातुएं उत्पन्न नहीं करता। उसे उन धातुओं के प्राप्त करने के लिए अपने व्यापार पर निर्भर रहना पड़ता था। यूरोपीय शक्तियों के आगमन के कारण भारत बहुमूल्य धातुओं के लिए पर्याप्त साधन नहीं जुटा सकता था। उस समय यूरोप में प्रचलित बहुमूल्य धातुओं के निर्यात पर निषेधाज्ञा लगी हुई थी ख्1, अतः उन्हें प्राप्त करने का एक मार्ग बन्द हो गया। परंतु यूरोप से बहुमूल्य धातुओं के प्राप्त करने का बहुत कम अवसर था, और इस निषेध के न होने पर भी वास्तव में बहुमूल्य धातुएं भारत में नहीं आई जब ऐसी निषेधाज्ञाएं हटा ली गई। ख्2, बहुमूल्य धातुओं के अंतः प्रवाह के रोकने का कारण श्री पेट्री द्वारा अपने नवम्बर, 1799 के कार्यवृत में मद्रास स्थित सुधार की समिति ख्3, (मद्रास कमेटी ऑफ रिफोर्म) में भलीभांति बताया गया है। श्री पेट्री के अनुसार यूरोपवासियों ने अपने राज्य क्षेत्रों के प्राप्त करने से पूर्व ‘‘यूरोप की धातुओं से भारत की बनी वस्तुओं को खरीदा। परंतु उन्होंने भारत की चांदी और सोने से इन खरीदों को आगे बढ़ाया, राजस्व में विदेशी सर्राफे के स्थान की पूर्ति की और अपनी ही मुद्रा से अपने उद्योग का मूल्य सहजभाव से अदा किया। सर्वप्रथम वाणिज्य के सिद्धांतों में इस क्रांति का बहुत कम अनुभव हुआ परंतु जब अंग्रेजों ने समृद्ध तथा विस्तृत राज्यों को अपने हाथ में ले लिया और जब युद्ध तथा वाणिज्यिक प्रतियोगिता की सफलता ने अन्य यूरोपीय राष्ट्रों से इस प्रकार निर्धारित वरीयता प्रदान की ताकि पूर्व के कुल वाणिज्य पर एकाधिकार हो जाए तथा जब पूर्व की निर्मित
- इंग्लैंड द्वारा आरोपित उनके इतिहास के लिए देखिए-रूडिंग -एन्नलस ऑफ कायनेज, तीसरा संस्करण,
खंड- I पृष्ठ 353-4,372, 376, 386-7, थॉमस वालेट, एन अपील टू सीफर, लंदन, 1660 पृष्ठ 26 2. इंग्लैंड से भारत को बहुमूल्य धातुओं के निर्यात संबंधी आगे दिए गए आंकड़े अधिक रुचिकर हैं
1652-1703................... £ 1,131,653 (श्री पेट्री के कार्यवृत से)
1747-1795.................. £ 1,519,654 (श्री पेट्री के कार्यवृत से)
- देखिए लेख- ‘‘भारत के संबंध में दि सिल्वर क्वश्चन’’ बंबई क्वार्टर रिव्यू, अप्रैल, 1857 में
प्रकाशित।