दोहरे मानक से रजत मानक तक
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बराबर चलता रहेगा और इस देश का वाणिज्य यदि स्थायी तौर पर नहीं होता तो कुछ समय के लिए परिचालित माध्यम के अभाव से पंगु होता जाएगा।’’ ख्1,
यदि ऋण-माध्यम होता तो मुद्रा का संकुचन इतनी तीव्रता से महसूस नहीं होता जितना कि हो गया था। परंतु कोई भी नाममात्र के लिए भी धन ऋण के लिए उपलब्ध नहीं था। सरकार ने ब्याज वाले खजाने के नोट जारी किए जो देश के परिचालित माध्यम का भाग बन गए। परंतु सरकार ने ब्याज दर पर खजाने से नोट जारी किए जो सरकार की परिचालन पद्धति का भाग बनी। किन्तु यह राशि बहुत ख्2, ही कम होने पर खजाने के नोटों ने ‘‘असफलता सिद्ध की जिसका पहला कारण उस शर्त से संबंधित था जिन्हें बारह महीनों के लिए राजस्व के भुगतान के लिए प्राप्त नहीं किया जाएगा। दूसरा कारण यह था कि उनका भुगतान अथवा प्राप्ति उसी स्थान पर होगी जहां से उन्हें जारी किया गया था। चूंकि इन नोटों का प्रयोग कलकत्ता, मद्रास और बंबई तक ही सीमित रखा गया, उनके परिचालन के प्रयोजनों का उपयोग तथा काम में लाने की स्थिति उन शहरों तक सीमित रखी गई....... और अंत में क्योंकि उनकी राशि अत्यधिक थी और ब्याज पर उनके परिचालन की अवधि बहुत कम थी’’ ख्3,
बैंकिंग पद्धति का इतना अधिक विकास नहीं हो पाया था कि वाणिज्य की मुद्रा संबंधी आवश्यकताओं को पूरा कर सकें। इसकी वृद्धि का मुख्य अवरोध की प्रवृत्ति रही। स्वयं में एक व्यापारिक संस्था के रूप में विनिमय का काम करने वाला अधिकरण (कोर्ट) बैंकिंग संस्थाओं के विकास के विरुद्ध था क्योंकि उसे डर था कि कहीं वे उसके प्रतिद्वन्द्वी न बन जाएं। अधिकरण के सौदागर राजकुमारों की संस्था न रहने के बाद भी यह शत्रुता की पारंपरिक नीति बनी रही, बैंक व्यापार की वृद्धि के साथ आगे नहीं बढ़े। वास्तव में 1856 तक भारत में बैंकों की संख्या कम थी और
रिपोर्ट देखें पृष्ठ 189
भारतीय खजाना नोटो की राशि जो बकाया थीµ
30 अप्रैल, 1850 को पौंड 804, 988
30 अप्रैल, 1851 को 802, 036 ईस्ट इंडिया रेवेन्यूज आदि पार्लियामेण्ट्री
30 अप्रैल, 1852 को 770, 301 पेपर 201, VIII, 1858 से संबंधित
30 अप्रैल, 1853 को 850, 432 विवरणिका की तालिका संख्या II से
30 अप्रैल, 1854 को 850, 627 उद्धृत किया गया।
30 अप्रैल, 1855 को 889, 875
30 अप्रैल, 1856 को 967, 711
- हाऊ टू मीट दि फाइनेंशियल डिफीकल्टीज ऑफ इंडिया लेखक ए.सी.बी. लंदन, 1859, पृष्ठ 131 कई
प्रकार से यह सबसे उल्लेखनीय है जिसने भारतीय मुद्रा और बैंकिंग में बाद के कई सुधारों को सुझाव
दिया।