दोहरे मानक से रजत मानक तक
उसके प्रचालक भी कम थे जैसा कि (तालिका V ) में दिखाया गया है।
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चांदी की अपर्याप्तता और ऋण मुद्रा के अभाव ने व्यापार के लिए ऐसी उलझन पैदा कर दी कि करेंसी एक्ट, 1835 की प्रवृत्ति में परिवर्तन उभर उठा तथा लोगों ने एक बार फिर पूछना प्रारंभ कर दिया कि यद्यपि द्विधातुवाद से एकल धातुवाद में परिवर्तन किया जाना श्रेयस्कर था तथापि चांदी के एकल धातुवाद की अपेक्षा सोने के एकल धातुवाद को वरीयता देना अधिक अच्छा था। जैसे ही अधिकाधिक सोने का आयात किया गया और उसके सिक्के बनाए गए वैसे ही भारतीय मुद्रा के तत्कालीन पद्धति में वैध प्रतिष्ठा देने की मांग बढ़ती गई। ख्1, सभी सोने की मुद्रा के सिद्धांत पर सहमत हो गए जो कुछ भी अंतर था, वह उसके अनुकूल के तरीके तक सीमित रहा। द्विधातु के आधार पर सोने के जारी किए जाने का प्रश्न ही नहीं उठता क्योंकि सरकार ने ‘‘आशाहीन प्रयास’’ करना मना कर दिया जिसके अनुसार सोने और चांदी के मूल्य को निर्धारित करने के लिए उनके मूल्य की स्वीकृति के लिए बाध्य किया जाना था। ख्2, सरकार जिन परियोजनाओं पर विचार करने को तत्पर थी ख्3, वे इस प्रकार थेµ (1) ‘‘सोवेरिन’’ अथवा किसी अन्य प्रकार के सोने के सिक्के को जारी करना तथा दिनप्रति दिन बाजार के भाव के अनुसार उसका परिचालन जैसा कि चांदी के संबंध में मापा गया था (2) एक नया सोने का सिक्का जारी करना जिस पर रुपयों की दी गई संख्या का वास्तविक मूल्य और एक सीमित अवधि के लिए उसे विधिमान्य चलार्थ मानना_ जब उसे फिर से समायोजित किया जा सके और फिर से मूल्यांकन किया जा सके तथा नई दर पर उसी अवधि के लिए विधिमान्य चलार्थ बनाया जा सके (3) अंग्रेजी सोवेरिन को इस रुपए के विधिमान्य चलार्थ के रूप में प्रारंभ करना परंतु 20 रुपये की राशि अथवा दो सोवेरिन के बराबर विधिमान्य चलार्थ तक सीमित रहना, अथवा (4) चांदी के मानक के स्थान पर सोने के मानक को स्थापित किया जाना।
इस परियोजनाओं में से पहली तीन परियोजनाएं मुद्रा संबंधी कार्यसाधकों के रूप में स्पष्टतया असुरक्षित थीं। मुद्रा के विभिन्न भागों के बीच मूल्य का स्थापित करना सुनियोजित मुद्रा संबंधी पद्धति की आवश्यक अपेक्षा है। प्रत्येक भोले-भाले की कीमत स्पष्ट होनी चाहिए, ताकि जिसको इसकी जानकारी की समझ न हो वह भी इसका
- अप्रैल, 1859 में कलकत्ता के देशी महाजन और सौदागरों द्वारा यह मामला पहली बार चर्चा का विषय
बना और इस संबंध में बंगाल चैम्बर ऑफ कॉमर्स के अध्यक्ष को पत्र लिखा गया। दोनों इस बात पर
सहमत हो गए कि भारत में सोने की मुद्रा की आवश्यकता है, देखिएµभारत में सोने की मुद्रा के प्रारंभ
करने से संबंधित लेख (पेपर्स रिलेटिंग टू दि इन्ट्रोडक्शन ऑफ ए गोल्ड करेंसी इन इंडिया), कलकत्ता,
1866 पृष्ठ 1-3
वही पृ. 6
देखिए कार्यवृत्त लेखक-राइट ऑनरेवल जेम्स विल्सन, तारीख 25 दिसम्बर, 1859, वही पृष्ठ 23