1. दोहरे मानक से रजत मानक तक - Page 65

50 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

मूल्य समझ सके। जब ऐसा सिक्का अपना मूल्य नहीं बता पाता तब वह केवल वस्तु बन जाता है और उसके मूल्य में उसी प्रकार का उतार-चढ़ाव होता है जैसा कि बाजार भावों में है। इस कसौटी ने पहली दो परियोजनाओं को निरस्त कर दिया। सिक्के को मुद्रा के रूप में चलाए जाने परµजिसके मूल्य के लिए कोई उत्तरदायी न हो जैसी कि पहली परियोजना के अंतर्गत स्थिति बन सकती थीµमूल्य आज कुछ है तो कल कुछ है। परिकलन व घटती-बढ़ती का हिसाब में जो कष्ट होता उसके अलावा यह एक लज्जाजनक ऐसा विषय बन जाता, यह कहना पड़ेगा कि सरकार ने इसे न अपना कर बुद्धिमत्ता का परिचय दिया। दूसरी परियोजना में ऐसी कोई बचाव की युक्ति नहीं कि पहली परियोजना की अपेक्षा इसको अपनाने की संस्तुति की जाती। यदि इसे स्वीकार किया जाता तो परिणाम यह होता कि उस अवधि में जब दर निर्धारित की गई, सोने को परिचालन में किया जाता मानों इसका बाजार-मूल्य अपेक्षाकृत कम था और वर्ष के अंत में यदि यह पता होता कि दर में संशोधन किया जाएगा और सिक्के का मूल्य सोने का मूल्य गिर जाने की समान स्थिति में कम हो जाएगा तो अधिक दर के सोने के सिक्के से बचने के लिए सामान्य संघर्ष और दूसरे के कंधों पर आवश्यक हानि के डालने से निश्चय ही बाद में घटित होता। तीसरा एक प्रकार से विचित्र प्रस्ताव था। यह संभव है कि कम मूल्य की धातु के पूर्ण मूल्य की अपेक्षा कम मूल्य के सिक्के ढाले जाएं ताकि छोटे-छोटे भुगतान किए जा सकें और उनकी वैधता को सीमित किया जा सके। परंतु यह उच्च मूल्य की धातु के लिए संभव नहीं है, इसका उद्देश्य है कि बड़े लेन-देन को सुविधा उपलब्ध कराई जाए। इस योजना के प्रति आपत्तियों को कठिनाई से छिपाया जा सका। जब तक सोने के मूल्य में कमी रहेगी तब तक इसका परिचालन बिल्कुल नहीं होगा। परंतु बाजार के अनुपात में परिवर्तन होने के कारण इसका अधिक मूल्य हो गया तो रुपये का परिचालन नहीं हुआ तथा दुकानदारों और व्यापारियों को ऐसा सिक्का मिला होता जो बड़े लेन-देन को चुकाने के लिए उपयोगी न होता।

इन दोषों से मुक्त केवल एक परियोजना थी जिसके अनुसार सोने के मानक को स्वीकार करना था और चांदी को सहायक मुद्रा माना जाना था। सरकार इस मांग के विरुद्ध जो सबसे शक्तिशाली तर्क दे सकती थी वह यह था कि ‘‘ऐसे देश में जहां सभी दायित्वों को चांदी में भुगतान के लिए सीमित कर दिया गया था, ऐसा कानून बनाना जिसके अनुसार बलपूर्वक किसी अन्य माध्यम से भुगतान किया जाना होता तो इससे साधारण रूप से ऋणी के लाभ के लिए ऋणदाता को धोखे में डालना होगा। ख्1, फिर भी यह तर्क कितना ही ठोस क्यों न हो, भारतीय मुद्रा के विस्तार करने के आधार पर रखने की बढ़ती हुई मांग के पूरा करने में निराशाजनक रूप से अपर्याप्त

  1. वही, पृष्ठ 26